कौन थे पेरियार? UPSC ने उनके आंदोलन से पूछ लिया सवाल, खूब होती है उनकी चर्चा
यूपीएससी 2025 प्रीलिम्स में पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन पर अभ्यर्थियों से सवाल पूछा जा चुका है। पेरियार आम दिनों भी अक्सर चर्चा में रहते हैं।

यूपीएससी (UPSC) सिविल सेवा परीक्षा को देश का सबसे कड़ा इम्तिहान कहा जाता है। हर साल जब इसका पेपर सामने आता है तो कई उम्मीदवारों के पसीने छूट जाते हैं। इसकी वजह सिर्फ सिलेबस का बड़ा होना नहीं है बल्कि सवालों का तेवर है जो हर बार बदल जाता है। अगर आप सोचते हैं कि सिर्फ तारीखें और नाम रट लेने से आप आईएएस बन जाएंगे तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा में हर तरह पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है। बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी जानकारियों को यूपीएससी अपने सवालों के जरिए अभ्यर्थियों से पूछ लेता है। अब जरा इसी सवाल पर गौर कर लीजिए जो 2025 के प्रीलिम्स में पूछा गया था - "निम्नलिखित में से किसने आत्मसम्मान आंदोलन की शुरुआत की?" जवाब तो इसका सीधा सा है 'ई.वी. रामास्वामी नायकर', जिन्हें दुनिया पेरियार के नाम से जानती है। पेरियार और उनका आंदोलन अक्सर चर्चा में रहता है।
बात करें पेरियार की तो उनका आत्मसम्मान आंदोलन कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। यह एक ऐसा बगावती कदम था जिसने उस वक्त की स्थापित हिंदू सामाजिक व्यवस्था, जातिवाद और गैर बराबरी को सीधी चुनौती दी थी। पेरियार का मकसद सिर्फ अंग्रेजों से आजादी पाना नहीं था। उनका मानना था कि जब तक समाज में ऊंच नीच, जाति पाति और अंधविश्वास रहेगा तब तक असली आजादी बेमानी है। उन्होंने एक ऐसे नए समाज का सपना देखा जो पूरी तरह से तर्क और इंसानियत पर टिका हो, जहां धर्म और भगवान के नाम पर किसी का शोषण न हो। अगर आप डीएमके (DMK) या एआईएडीएमके (AIADMK) जैसी आज की बड़ी राजनीतिक पार्टियों की विचारधारा को समझना चाहते हैं, तो आपको पेरियार के इसी आत्मसम्मान आंदोलन की जड़ों तक जाना ही पड़ेगा।
क्या था आत्मसम्मान आंदोलन?
आत्मसम्मान आंदोलन सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना नहीं बल्कि यह सदियों से चली आ रही गैर-बराबरी की उस व्यवस्था के खिलाफ एक सीधी बगावत थी जिसने समाज के एक बड़े हिस्से को हाशिए पर धकेल रखा था। 1925 में जब ई.वी. रामास्वामी (पेरियार) ने इस आंदोलन की नींव रखी तो उनका मकसद समाज की उन बुनियादी जड़ों को हिलाना था जो जाति, धर्म और अंधविश्वास के नाम पर इंसान को इंसान का दर्जा नहीं दे रही थीं। आइए इस आंदोलन के कुछ सबसे अहम पहलुओं को गहराई से समझते हैं...
कांग्रेस से मोहभंग और आंदोलन की शुरुआत
पेरियार पहले महात्मा गांधी के बड़े समर्थक थे और कांग्रेस के एक कद्दावर नेता माने जाते थे। लेकिन चेरनमादेवी गुरुकुलम (एक स्कूल जिसे कांग्रेस से फंड मिलता था) की एक घटना ने सब बदल दिया। वहां सवर्ण और गैर-सवर्ण (निचली जातियों) के बच्चों के लिए खाने-पीने की व्यवस्था अलग-अलग थी। पेरियार ने इसका कड़ा विरोध किया। जब कांग्रेस ने इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया और उन्हें लगा कि पार्टी में ब्राह्मणों का वर्चस्व है, तो 1925 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और 'आत्मसम्मान आंदोलन' की शुरुआत की।
आत्मसम्मान विवाह
यह इस आंदोलन का सबसे क्रांतिकारी और व्यावहारिक कदम था। पेरियार ने देखा कि शादियों में पुरोहितों (पंडितों) और संस्कृत मंत्रों का इस्तेमाल आम लोगों को हीन भावना से भर देता है, क्योंकि वे इन मंत्रों का मतलब ही नहीं समझते थे। उन्होंने 'आत्मसम्मान विवाह' का कॉन्सेप्ट दिया। इसमें किसी भी पुरोहित की जरूरत नहीं होती थी। शादी सिर्फ दूल्हा-दुल्हन के एक-दूसरे को माला पहनाने और बराबरी की शपथ लेने से हो जाती थी। इन शादियों में दहेज का सख्त विरोध किया गया। अंतरजातीय और विधवा विवाह को खुलकर बढ़ावा दिया गया। बाद में तमिलनाडु सरकार ने 1967 में इन शादियों को कानूनी मान्यता भी दे दी।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत इसका तर्कवाद था। पेरियार का साफ कहना था कि जो चीज आपके तर्क (लॉजिक) की कसौटी पर खरी न उतरे, उस पर आंख मूंदकर भरोसा मत करो। उन्होंने देवी-देवताओं की मूर्तियों, धार्मिक कर्मकांडों और अंधविश्वासों का कड़ा विरोध किया। उनका मानना था कि धर्म और भगवान का डर दिखाकर ही चंद लोग समाज के बड़े हिस्से को अपना गुलाम बनाए हुए हैं।
भाषा और द्रविड़ अस्मिता पर जोर
इस आंदोलन ने उत्तर भारत और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक खाई को भी उभारा। पेरियार ने हिंदी को थोपे जाने का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तमिल भाषा, तमिल संस्कृति और द्रविड़ पहचान को एक नई ऊर्जा दी। उनका मानना था कि उत्तर भारतीय संस्कृति (आर्य) दक्षिण की द्रविड़ संस्कृति पर अपना दबदबा बनाना चाहती है, जिसे रोका जाना चाहिए।
राजनीतिक और सामाजिक असर
आज अगर तमिलनाडु की राजनीति को देखें तो वह पूरे भारत से अलग नजर आती है। इसकी वजह यही आंदोलन है। जस्टिस पार्टी आगे चलकर पेरियार के नेतृत्व में द्रविड़ कड़गम (DK) बनी। इसी संगठन से निकलकर बाद में डीएमके (DMK) और एआईएडीएमके (AIADMK) जैसी पार्टियां बनीं जो आज भी तमिलनाडु की सत्ता के केंद्र में हैं।




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