PhD : पकड़ी गई चोरी, 95 फीसदी पीएचडी थीसिस AI से, कंटेंट चुराया हुआ, जानें कितनी फीसदी कॉपी का है नियम
लखनऊ यूनिवर्सिटी में इस वर्ष जनवरी और फरवरी माह में पीएचडी की जो थीसिस जमा की गईं, उनमें 95 फीसदी से ज्यादा थीसिस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल पाया गया है।

लखनऊ यूनिवर्सिटी में इस वर्ष जनवरी और फरवरी माह में पीएचडी की जो थीसिस जमा की गईं, उनमें 95 फीसदी से ज्यादा थीसिस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल पाया गया है। साथ ही उनमें साहित्यिक चोरी (प्लेगिएरिज्म - Plagiarism) भी पकड़ी गई है। इस चोरी को ड्रिलबिट ( DrillBit) नाम के सॉफ्टवेयर ने पकड़ा है जो कहीं से कॉपी किए गए कंटेंट और एआई की मदद से लिखे गए कंटेंट को पकड़ने के लिए बनाया गया एक टूल है। टैगोर लाइब्रेरी से मिले डेटा के मुताबिक जमा हुई 121 थीसिस में से 116 में पिछली रिसर्च से समानताएं मिलीं, जिससे पता चलता है कि उन्हें लिखने के लिए एआई से बने कंटेंट का इस्तेमाल किया गया था।
ये समानताएं इसलिए पकड़ी गईं क्योंकि एआई चैटबॉट के डेटाबेस पहले से मौजूद टेक्स्ट और दुनिया भर में पहले से की गई रिसर्च के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लखनऊ यूनिवर्सिटी के नियमों के मुताबिक 180 शब्दों तक या 5% से कम साहित्यिक चोरी की छूट है। यह छूट उन उद्धरणों और तथ्यों के लिए है जो पत्रिकाओं, किताबों और यहां तक कि एआई डेटाबेस में भी उपलब्ध हैं। हालांकि अधिकारियों ने बताया कि इन मामलों में साहित्यिक चोरी 20-50 फीसदी तक पाई गई।
टीओआई की खबर के मुताबिक इन शोधार्थियों ने 2019-2020, 2020-21 और कुछ ने 2021-22 के शैक्षणिक सत्रों में दाखिला लिया था। उन्होंने अब अपना रिसर्च का काम पूरा कर लिया है और अपनी थीसिस जमा कर दी है। नियमों के मुताबिक, जब कोई छात्र अपनी थीसिस पूरी कर लेता है, तो उसे टैगोर लाइब्रेरी में उसकी एक सॉफ्ट कॉपी जमा करनी होती है। वहां ड्रिलबिट के जरिए रिसर्च में साहित्यिक चोरी की जांच की जाती है। एक बार मंजूरी मिलने पर थीसिस स्वीकार कर ली जाती है, लेकिन अगर साहित्यिक चोरी पकड़ी जाती है, तो रिसर्च को शोधार्थी को वापस भेज दिया जाता है ताकि वह उसे ऑरिजनल बना सके।
कला संकाय के एक वरिष्ठ प्रोफेसर ने कहा कि इस सुधार से आखिरकार ऑरिजनल थीसिस लिखने वाले शोधार्थियों का पलड़ा भारी हो गया है। ये वे लोग हैं जो AI चैटबॉट पर निर्भर रहने के बजाय किताबों में घंटों खपाते हैं। कई शोधार्थियों ने भी कहा कि अब मेहनत का फर्क साफ नजर आ रहा है।
एक विशेषज्ञ मुकुल श्रीवास्तव ने कहा कि एआई का इस्तेमाल उन कामों में किया जाना चाहिए जिनमें ज्यादा समय लगता हो या जो थकाने वाले हों। लेकिन, जब एआई का इस्तेमाल सोचने के लिए किया जाता है, तो रिसर्च अपनी मौलिकता खो देती है। मानद लाइब्रेरियन कीया पांडे ने बताया कि एआई टूल्स पर बहुत ज्यादा निर्भरता धीरे-धीरे रिसर्च की गहराई और मौलिकता को कमजोर कर रही है। उन्होंने आगे कहा कि साहित्यिक चोरी की जांच का मकसद सिर्फ नकल पकड़ना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि शोधार्थी फिर से असल व नए आइडिया की ओर लौटें जहां आलोचनात्मक सोच और प्रामाणिकता ही मुख्य केंद्र हों।
उन्होंने कहा, 'हम जल्द ही टर्निटिन (Turnitin) सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल शुरू करेंगे, जो यूजी और पीजी लेवल के छात्रों द्वारा जमा किए गए असाइनमेंट की जांच करने में भी मदद करेगा।'
अब देना होगा शपथपथ
शोध में ईमानदारी बनाए रखने के लिए अब थीसिस जमा करते समय शोधार्थी को यह शपथ पत्र देना होगा कि उसमें साहित्यिक चोरी 10 प्रतिशत से कम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की सहायता भी 10 प्रतिशत से कम है। परीक्षकों को अब केवल थीसिस की सॉफ्ट कॉपी भेजी जाएगी। यदि परीक्षक सात दिनों में अपनी सहमति नहीं देते हैं तो उन्हें बदला जा सकता है।
अब वर्ष में दो बार होंगे पीएचडी में प्रवेश
लखनऊ विश्वविद्यालय में अब वर्ष में दो बार पीएचडी में प्रवेश प्रक्रिया शुरू होगी। पहली बार कॉन्ट्रेक्ट शिक्षकों को भी पीएचडी कराने का मौका मिलेगा। प्रवेश पाने वाले अभ्यर्थी ऑफलाइन की जगह ऑनलाइन थीसिस जमा करेंगे। विश्वविद्यालय में शनिवार को आयोजित विद्या परिषद की बैठक में नए नियमों के साथ पीएचडी अध्यादेश 2026 को मंजूरी दी गई। अब वर्ष में दो बार मई और दिसंबर में पीएचडी प्रवेश की अधिसूचना जारी होगी। प्रवेश के लिए तीन चरण तय किए गए हैं। पहले चरण में यूजीसी-जेआरएफ, सीएसआईआर-जेआरएफ, आईसीएमआर, डीबीटी और एआईसीटीई डॉक्टोरल फेलोशिप वाले अभ्यर्थी को प्रवेश मिलेगा। दूसरे चरण में खाली सीटों पर वे अभ्यर्थी पात्र होंगे जो प्रोफेसर या पीएचडी प्रवेश के लिए यूजीसी-नेट/सीएसआईआर नेट पास हैं। तीसरे चरण में खाली सीटें यदि रह जाती हैं तो उनका विज्ञापन निकालने के बाद एंट्रेस के आधार प्रवेश दिया जाएगा।




साइन इन