NEET UG : MBBS की सरकारी NRI सीटें अपात्र छात्रों को बांटीं, 64000 की जगह वसूले 25 लाख रुपये, हंगामा
NEET UG MBBS Admissions : पहले 15 फीसदी सस्ती सरकारी एमबीबीएस सीटों को एनआरआई कोटे में डाला गया। फीस काफी ऊंची रखी गई। इसके बाद इस कोटे की आधी से कहीं ज्यादा सीटें उन्हें दे दी गईं जो इसके हकदार थे ही नहीं। मामला कर्नाटक का है।

कर्नाटक में सरकारी मेडिकल कॉलेजों की एमबीबीएस सीटों में एनआरआई कोटा शामिल करने को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा गया है। सरकारी एमबीबीएस सीटों में एनआरआई कोटा एड करने के राज्य सरकार के फैसले की कड़ी आलोचना की जा रही है। आलोचकों का आरोप है कि इस फैसले के चलते सस्ती सरकारी एमबीबीएस सीटें ऊंची कीमत पर बेची जा रही हैं। नीट यूजी 2025 काउंसलिंग के दौरान सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एनआरआई कैटेगरी के तहत 57 एमबीबीएस सीटें तय की गई थीं। हालांकि इनमें से केवल 18 पात्र एनआरआई उम्मीदवारों ने ही सीटें लीं। शेष 39 सीटें बाद में गैर एनआरआई छात्रों को 25 लाख रुपये प्रति वर्ष की ऊंची एनआरआई फीस पर आवंटित कर दी गईं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक कई राजनेताओं और मेडिकल शिक्षा से जुड़े हितधारकों ने तीखी आलोचना की है। उनका कहना है कि होनहार छात्रों को उन सरकारी संस्थानों से बाहर किया जा रहा है जिनका मकसद सस्ती मेडिकल शिक्षा देना रहा है। सरकारी एमबीबीएस सीटों पर एनआरआई कोटे के तहत दाखिला देने की यह नीति सितंबर 2025 में घोषित की गई थी, जब राज्य सरकार ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 15 फीसदी सीटें एनआरआई के लिए अधिक फीस पर आरक्षित करने का फैसला किया। इससे पहले यह व्यवस्था केवल प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों तक सीमित थी।
सरकारी फीस 64 हजार जबकि एनआरआई फीस 25 लाख
जहां एक सामान्य सरकारी एमबीबीएस सीट की सालाना फीस 64,350 रुपये है, वहीं एनआरआई कोटा सीट की फीस 25 लाख रुपये प्रति वर्ष तय की गई। कर्नाटक के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में एनआरआई कोटा सीटों की फीस 45 लाख रुपये प्रति वर्ष तक है। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाना और राज्य अनुदानों पर निर्भरता कम करना है।
सरकारी मेडिकल सीटों में एनआरआई कोटा डालने की नीति तब घोषित की गई जब काउंसलिंग के पहले राउंड की सीट मैट्रिक्स तय हो चुकी थी। ऐसे में यह कोटा केवल 10 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में बनाई गई 252 अतिरिक्त सीटों पर लागू हुआ, जिनमें से 57 सीटें एनआरआई श्रेणी में थीं।
39 सीटें उन्हें मिलीं जो एनआरआई नहीं थे
कर्नाटक एग्जाम अथॉरिटी (केईए) के आंकड़ों के अनुसार केवल 18 पात्र एनआरआई उम्मीदवारों ने आवेदन किया और उन्हें सीटें आवंटित हुईं। नियमों के अनुसार बची हुईं 39 सीटें उन गैर एनआरआई उम्मीदवारों को दी गईं जो एनआरआई फीस चुकाने को तैयार थे। गैर एनआरआई उम्मीदवारों को सरकारी एमबीबीएस सीटें देने पर विवाद और गहरा गया है।
विधानसभा भाजपा विधायक वाई. भरत शेट्टी ने उठाया मामला
यह मुद्दा इसी सप्ताह विधानसभा में मंगलुरु नॉर्थ से भाजपा विधायक वाई. भरत शेट्टी ने उठाया। उन्होंने आरोप लगाया, 'भारत में पहली बार कर्नाटक सरकार 25 लाख रुपये प्रति वर्ष में सरकारी मेडिकल सीटें बेच रही है।' उन्होंने कहा, 'जो सीटें एक से डेढ़ लाख रुपये प्रति वर्ष में किसी होनहार कन्नड़ छात्र के लिए होनी चाहिए थीं, उन्हें सरकार कहीं ज्यादा कीमत पर बेच रही है।'
अधिकारी बोले , यह नीति पहले से, अन्य राज्य में भी ऐसा होता है
हालांकि, सरकारी अधिकारियों ने नीति का बचाव करते हुए कहा कि गुजरात और राजस्थान में भी इसी तरह के मॉडल अपनाए जाते हैं। एक अधिकारी ने कहा, 'यह प्रस्ताव 2005 से मौजूद है। इसका उद्देश्य कॉलेजों को बुनियादी ढांचे के विकास, सुविधाओं में सुधार और छात्र कल्याण के लिए संसाधन जुटाने में मदद करना है।' उन्होंने यह भी तर्क दिया कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा सरकारी कॉलेजों में सीटों की संख्या बढ़ाए जाने से सामान्य श्रेणी के छात्रों को नुकसान नहीं होगा।
फंड के दुरुपयोग का आरोप
भाजपा विधायक वाई. भरत शेट्टी ने आरोप लगाया कि राजीव गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज (RGUHS) से धन निकालकर नए मेडिकल कॉलेज शुरू किए जा रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया, “जब रामनगर कॉलेज सीधे RGUHS द्वारा संचालित है, तो कनकपुरा और बागलकोट मेडिकल कॉलेजों के लिए विश्वविद्यालय से पैसा क्यों निकाला जा रहा है? क्या सरकार को इस उद्देश्य के लिए अलग से धन आवंटित नहीं करना चाहिए?” शेट्टी ने दावा किया कि नए कॉलेजों के लिए 500 करोड़ रुपये का उपयोग किया गया है।




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