आंसुओं को बनाया ताकत, पिता के निधन के 10 दिन बाद दिया UPSC इंटरव्यू; बिना कोचिंग जूही ने पाई सफलता
किशनगंज की बेटी जूही दास ने बिना कोचिंग के 649वीं रैंक के साथ UPSC एग्जाम पास किया, और अपने पिता की दुखद और अचानक मौत के ठीक दस दिन बाद इंटरव्यू में शामिल होकर बहुत हिम्मत दिखाई।

जिंदगी जब सबसे कड़े इम्तिहान लेती है, तो अक्सर इंसान टूटकर बिखर जाता है। लेकिन जो उन मुश्किलों की आग में तपकर, अपने आंसुओं को अपनी ढाल बनाकर बाहर निकलता है, वही असल मायने में इतिहास रचता है। बिहार के किशनगंज शहर की रहने वाली जूही दास की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिसे सुनकर किसी की भी आंखें नम हो जाएं और सीना फख्र से चौड़ा हो जाए। देश की सबसे कठिन और प्रतिष्ठित यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (UPSC) परीक्षा में जूही दास ने शानदार कामयाबी हासिल करते हुए 649वां रैंक हासिल किया है।
जूही की यह सफलता महज एक परीक्षा पास करने की खबर नहीं है, बल्कि यह कहानी है एक बेटी के उस अदम्य साहस की, जिसने अपने पिता की चिता की राख ठंडी होने से पहले ही अपने सपनों की उड़ान भर ली। यह कहानी इस बात का भी जीता-जागता सबूत है कि अगर आपके हौसलों में जान हो, तो दिल्ली के महंगे कोचिंग सेंटर्स के बिना भी सिविल सर्विसेज का पहाड़ खोदा जा सकता है। आइए, किशनगंज के खगड़ा प्रेमपुल इलाके से निकलकर यूपीएससी के फाइनल रिजल्ट तक पहुंचने वाली जूही दास के इस प्रेरणादायक सफर को करीब से जानते हैं।
दुखों का पहाड़ और एक बेटी का अटल संकल्प
यूपीएससी की तैयारी करने वाले छात्र जानते हैं कि इसका इंटरव्यू (Personality Test) कितना तनावपूर्ण होता है। उम्मीदवार महीनों पहले से खुद को मानसिक तौर पर मजबूत करने में लग जाते हैं। लेकिन जूही के लिए यह वक्त उनकी ज़िंदगी का सबसे काला दौर लेकर आया। 24 फरवरी को जूही का यूपीएससी का साक्षात्कार होना था, लेकिन ठीक दस दिन पहले, 13 फरवरी को बीमारी के चलते उनके पिता निवारन दास का अचानक देहांत हो गया।
जिस घर में पिता का साया उठ गया हो, वहां का माहौल कैसा होगा, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। एक तरफ पिता को खोने का गहरा सदमा और दूसरी तरफ ज़िंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान। लेकिन जूही ने अपने पिता के सपनों को टूटने नहीं दिया। उन्होंने अपने आंसुओं को अपनी आंखों में समेटा और भारी मन से इंटरव्यू बोर्ड के सामने बैठीं। उनका यह फैसला न सिर्फ उनके मजबूत इरादों को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि विपरीत हालात में भी खुद को कैसे संभाला जाता है। आज उनका अंतिम रूप से चयन उनके पिता को दी गई सबसे सच्ची और खूबसूरत श्रद्धांजलि है।
बिना कोचिंग के सेल्फ-स्टडी से पाई कामयाबी
अक्सर यूपीएससी की तैयारी करने वाले युवाओं में यह धारणा होती है कि बिना किसी बड़े कोचिंग संस्थान में लाखों रुपये खर्च किए यह परीक्षा पास नहीं की जा सकती। जूही ने इस मिथक को पूरी तरह से तोड़ दिया है। सबसे खास बात यह रही कि जूही किसी भी कोचिंग संस्थान में पढ़ाई नहीं कर रही थीं। उन्होंने पूरी तैयारी 'सेल्फ-स्टडी' (Self-Study) के दम पर की। जरूरत पड़ने पर वह कभी-कभार कुछ संस्थानों से ऑनलाइन नोट्स मंगवा लिया करती थीं।
जूही की यह सफलता उन लाखों युवाओं के लिए एक बहुत बड़ा सबक है, जो संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं। जूही के पिता घर के पास ही मोटर पार्ट्स की एक छोटी सी दुकान चलाते थे, जबकि उनकी मां अन्निका दास 'न्यायमित्र' के तौर पर काम करती हैं। अपनी मां को न्याय व्यवस्था से जुड़ा काम करते देख ही जूही के मन में सिविल सेवा में जाने और समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा जगी थी। इस पूरे सफर में उन्हें सपन कुमार दास और सुशोभन दास जैसे मेंटर्स का भी बेहतरीन मार्गदर्शन मिला।
असफलताओं से सीखा, कभी हार नहीं मानी
यूपीएससी का सफर रातों-रात तय नहीं होता। जूही को यह कामयाबी उनके चौथे प्रयास में मिली है। यह बात उनके धैर्य और निरंतर प्रयास की गवाही देती है। इससे पहले अपने दूसरे और तीसरे प्रयास में भी जूही साक्षात्कार के चरण तक पहुंची थीं, लेकिन अंतिम सूची में जगह बनाने से चूक गई थीं।
बार-बार इंटरव्यू तक पहुंचकर बाहर हो जाना किसी भी उम्मीदवार को मानसिक रूप से तोड़ सकता है। लेकिन जूही ने हार मानने के बजाय अपनी कमियों को पहचाना, उन्हें सुधारा और चौथी बार में बाजी मार ली।
शुरू से ही पढ़ाई में अव्वल रही हैं जूही
जूही की शैक्षणिक पृष्ठभूमि बताती है कि वह हमेशा से एक मेधावी छात्रा रही हैं। उन्होंने साल 2015 में किशनगंज के बाल मंदिर सीनियर सेकेंडरी स्कूल से शानदार 9.4 सीजीपीए (CGPA) के साथ अपनी मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। इसके बाद साल 2017 में उन्होंने विशाखापट्टनम के चैतन्या कॉलेज से 92 प्रतिशत अंकों के साथ इंटरमीडिएट पूरा किया। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने कोलकाता का रुख किया और वहां से अपनी बीटेक (B.Tech) की डिग्री हासिल की।




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