जुनून हो तो ऐसा! सेना से रिटायर होने के बाद 55 की उम्र में दशरथ सिंह ने बटोरीं 138 डिग्रियां; इग्नू में रचा इतिहास
Rajasthan EX Serviceman: 55 वर्ष की आयु में, जहां लोग रिटायरमेंट के बाद आराम की योजना बनाते हैं, वहीं राजस्थान के दशरथ सिंह ने अपनी 138वीं डिग्री हासिल कर शिक्षा जगत में हलचल मचा दी है।

Dashrath Singh Success Story: कहते हैं कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती और न ही ज्ञान प्राप्त करने की कोई सीमा। इस कहावत को राजस्थान के एक पूर्व सैनिक ने न केवल सच कर दिखाया है, बल्कि एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया है जिसे देख दुनिया दंग है। 55 वर्ष की आयु में, जहां लोग रिटायरमेंट के बाद आराम की योजना बनाते हैं, वहीं राजस्थान के दशरथ सिंह ने अपनी 138वीं डिग्री हासिल कर शिक्षा जगत में हलचल मचा दी है।
हाल ही में आयोजित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) के दीक्षांत समारोह में दशरथ सिंह आकर्षण का केंद्र रहे, जहां उन्हें उनकी नई उपलब्धि के लिए सम्मानित किया गया।
देश सेवा के बाद अब 'डिग्रियों' का जुनून
दशरथ सिंहभारतीय सेना के एक रिटायर्ड सैनिक हैं। दशरथ 1988 में भारतीय सेना में शामिल हुए थे। उन्होंने 16 वर्षों तक एक गैर-कमीशन अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएं दीं और साल 2004 में सेना से सेवानिवृत्त हुए। सेना में अनुशासन और कड़ी मेहनत सीखने के बाद, उन्होंने अपनी इस ऊर्जा को शिक्षा की ओर मोड़ दिया। 138 डिग्रियां, डिप्लोमा और प्रमाणपत्र हासिल करना कोई छोटा काम नहीं है। उनकी इस उपलब्धि के पीछे दशकों की निरंतर पढ़ाई और कभी न खत्म होने वाली जिज्ञासा है। 55 वर्षीय दशरथ सिंह ने शिक्षा के क्षेत्र में 11 विश्व रिकॉर्ड बनाने का दावा किया है। उन्हें इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स और इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स सहित कई संस्थाओं से सम्मान मिला है।
दशरथ सिंह बताते हैं कि उनके पास इतिहास, राजनीति विज्ञान, लोक प्रशासन, समाजशास्त्र और कई अन्य विषयों में डिग्रियां हैं। उनके पास इतनी डिग्रियां हैं कि उन्हें रखने के लिए घर में अलग से जगह बनानी पड़ी है। उनकी इस यात्रा ने यह साबित कर दिया है कि यदि आपके पास संकल्प है, तो संसाधनों या उम्र की कोई बाधा आपको रोक नहीं सकती।
इग्नू के दीक्षांत समारोह में मिली विशेष पहचान
इग्नू (IGNOU) के दीक्षांत समारोह में जब दशरथ सिंह को मंच पर बुलाया गया, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने उनकी सराहना करते हुए उन्हें आजीवन शिक्षार्थी का बेहतरीन उदाहरण बताया। दशरथ सिंह ने इस समारोह में अपनी नई शैक्षणिक योग्यता का प्रमाण पत्र प्राप्त किया, जो उनकी लंबी लिस्ट में 138वें स्थान पर जुड़ गया।
आखिर क्यों पढ़ते हैं दशरथ सिंह?
अक्सर लोग दशरथ सिंह से पूछते हैं कि इतनी डिग्रियों का वे क्या करेंगे? इस पर उनका सरल सा जवाब होता है— "ज्ञान ही शक्ति है।" वे केवल नौकरी या करियर के लिए नहीं पढ़ते, बल्कि वे इसलिए पढ़ते हैं क्योंकि उन्हें नई चीजें सीखना पसंद है। उनका मानना है कि शिक्षा व्यक्ति के नजरिए को बदल देती है और समाज को समझने की बेहतर दृष्टि प्रदान करती है।
एक पूर्व सैनिक होने के नाते, वे युवाओं को संदेश देते हैं कि वे अपना समय व्यर्थ न गंवाएं। उनके अनुसार, मोबाइल और सोशल मीडिया के दौर में किताबें ही इंसान की सबसे अच्छी दोस्त हैं।
भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा
दशरथ सिंह की कहानी आज के उन युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा है जो छोटी-छोटी असफलताओं से हार मान लेते हैं या पढ़ाई को एक बोझ समझते हैं। 55 साल की उम्र में भी उनकी आंखों में वही चमक है जो एक स्कूल जाने वाले जिज्ञासु बच्चे में होती है। राजस्थान के इस 'विद्यार्थी' ने यह स्पष्ट कर दिया है कि रिटायरमेंट केवल नौकरी से होता है, दिमाग और सीखने की प्रक्रिया से नहीं।




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