रिजल्ट के बाद इन तीन छात्रों ने उठाए OSM सिस्टम पर सवाल, देशभर में छिड़ गई बहस; CBSE को देना पड़ा जवाब
CBSE के ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम को लेकर उठे विवाद में तीन छात्रों की भूमिका सबसे ज्यादा चर्चा में है। इन छात्रों ने जो सवाल उठाए उसके बाद बोर्ड को अपनी सफाई देने पड़ी।

आज के दौर में सोशल मीडिया पर कोई शिकायत वायरल होना नई बात नहीं है। लेकिन बहुत कम ऐसा होता है जब कुछ युवाओं के सवाल देश की सबसे बड़ी शिक्षा संस्थाओं में से एक को बार-बार सफाई देने पर मजबूर कर दें। CBSE के ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है, उसकी सबसे खास बात यही है। इस पूरे मामले में न तो शुरुआत किसी राजनीतिक आंदोलन से हुई और न ही किसी बड़े संगठन ने मोर्चा संभाला। कहानी की शुरुआत उन छात्रों और युवाओं से हुई जिन्होंने अपने अनुभव, डॉक्यूमेंट्स की पड़ताल और तकनीकी जांच के आधार पर सवाल उठाए। धीरे-धीरे ये सवाल लाखों लोगों तक पहुंचे और फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गए।
गौरतलब है कि इस साल CBSE ने उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में बड़े पैमाने पर डिजिटल व्यवस्था अपनाई। बोर्ड का दावा था कि इससे प्रक्रिया तेज होगी, मानवीय गलतियां कम होंगी और पारदर्शिता बढ़ेगी। लेकिन परिणाम घोषित होने के कुछ ही दिनों बाद अलग-अलग जगहों से छात्रों की शिकायतें आने लगीं। कुछ छात्रों ने कहा कि उन्हें जो उत्तर पुस्तिकाएं दिखाई गईं, वे साफ नहीं थीं। कुछ ने आरोप लगाया कि उनके जवाबों का मूल्यांकन नहीं हुआ। वहीं कुछ मामलों में उत्तर पुस्तिकाओं के मिलान को लेकर भी सवाल उठे। यहीं से लोगों का ध्यान इस नए सिस्टम की ओर गया।
एक उत्तर पुस्तिका ने बदल दी पूरी बहस
दिल्ली के छात्र वेदांत श्रीवास्तव को जब अपनी उत्तर पुस्तिका की प्रति मिली तो उन्हें लगा कि कुछ गड़बड़ है। उन्होंने दावा किया कि जो कॉपी उन्हें भेजी गई, वह उनकी थी ही नहीं। उन्होंने यह बात सोशल मीडिया पर साझा की। कुछ ही घंटों में हजारों लोग उनकी पोस्ट देखने लगे और मामला तेजी से फैल गया। छात्रों और अभिभावकों के बीच यह सवाल उठने लगा कि यदि एक छात्र के साथ ऐसा हो सकता है तो क्या अन्य मामलों में भी ऐसी गलतियां संभव हैं? बढ़ती चर्चा के बाद CBSE ने मामले की जांच की और छात्र को सही उत्तर पुस्तिका उपलब्ध कराई। हालांकि तब तक यह घटना OSM विवाद का सबसे चर्चित चेहरा बन चुकी थी।
एक किशोर ने डॉक्यूमेंट्स में तलाशे जवाब
जब अधिकांश लोग परिणामों पर चर्चा कर रहे थे, तब झारखंड के 17 वर्षीय सार्थक सिधांत ने अलग रास्ता चुना। उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि आखिर इस डिजिटल मूल्यांकन व्यवस्था को लागू करने वाली कंपनी का चयन कैसे हुआ। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध टेंडर डॉक्यूमेंट्स का अध्ययन करने के बाद उन्होंने अपनी टिप्पणियां एक ब्लॉग में साझा कीं। उनका दावा था कि टेंडर प्रक्रिया के दौरान कुछ शर्तों में बदलाव हुए, जिनकी जांच होनी चाहिए। सार्थक की पोस्ट ने जल्द ही राजनीतिक और सार्वजनिक ध्यान आकर्षित कर लिया। कई नेताओं ने उनके द्वारा उठाए गए सवालों का जिक्र किया और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की। हालांकि CBSE और संबंधित कंपनी का कहना है कि पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत हुई और किसी को विशेष लाभ पहुंचाने का सवाल ही नहीं उठता।
फिर सामने आया साइबर सुरक्षा का पहलू
विवाद को नया मोड़ तब मिला जब एक युवा साइबर रिसर्चर निसर्ग अधिकारी ने दावा किया कि उन्होंने मूल्यांकन से जुड़े एक पोर्टल में सुरक्षा कमजोरियां देखी हैं। शुरुआत में इन दावों को गंभीरता से नहीं लिया गया और बोर्ड ने कहा कि जिस प्लेटफॉर्म का जिक्र किया जा रहा है, वह वास्तविक मूल्यांकन प्रणाली नहीं बल्कि परीक्षण के लिए इस्तेमाल होने वाला हिस्सा था। लेकिन बाद में CBSE ने स्वीकार किया कि कुछ तकनीकी कमजोरियों की पहचान हुई है और उन्हें दूर करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। बोर्ड ने यह भी बताया कि विशेषज्ञ संस्थाओं की मदद से सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की जा रही है। यहीं से बहस सिर्फ अंकों और मूल्यांकन तक सीमित नहीं रही, बल्कि डिजिटल सुरक्षा का मुद्दा भी इसमें जुड़ गया।
राजनीति क्यों कूदी इस विवाद में?
जैसे-जैसे सोशल मीडिया पर यह मामला बढ़ता गया वैसे-वैसे राजनीतिक दल भी सक्रिय होते गए। विपक्षी नेताओं ने छात्रों द्वारा उठाए गए सवालों को शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही से जोड़कर देखा। राहुल गांधी ने इस पूरे प्रकरण में सक्रिय रुचि दिखाई और सार्वजनिक रूप से उन युवाओं का उल्लेख किया जिन्होंने मामले को सामने लाने में भूमिका निभाई। विपक्ष का कहना है कि छात्रों की चिंताओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। दूसरी ओर सरकार और CBSE का तर्क है कि कुछ मामलों के आधार पर पूरे सिस्टम को असफल नहीं कहा जा सकता और सुधार की प्रक्रिया लगातार जारी है।
आखिर यह मामला इतना बड़ा क्यों बन गया?
भारत में हर साल करोड़ों छात्र बोर्ड और प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होते हैं। ऐसे में मूल्यांकन प्रक्रिया पर भरोसा बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। जब किसी छात्र को लगता है कि उसकी कॉपी ठीक से नहीं जांची गई, या सिस्टम में तकनीकी खामी हो सकती है, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं रह जाता। CBSE का कहना है कि अधिकांश मूल्यांकन प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हुई और जहां भी शिकायतें मिली हैं, वहां सुधारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं। वहीं छात्रों और अभिभावकों का एक वर्ग चाहता है कि पूरे मामले की पारदर्शी समीक्षा हो ताकि भविष्य में किसी भी तरह का संदेह न रहे।
इस पूरे विवाद की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसकी अगुवाई किसी संगठन, छात्र संघ या राजनीतिक दल ने नहीं की। एक छात्र ने अपनी समस्या साझा की, दूसरे ने डॉक्यूमेंट्स की जांच की और तीसरे ने तकनीकी कमियों पर ध्यान दिलाया। इन तीनों की कोशिशों ने यह दिखाया कि डिजिटल दौर में सवाल पूछने और जवाब मांगने के तरीके बदल चुके हैं। अब एक वायरल पोस्ट, एक ब्लॉग या एक तकनीकी जांच भी ऐसी बहस खड़ी कर सकती है जो देशभर में सुर्खियां बन जाए।




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