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रुपये में ऐतिहासिक गिरावट: क्या हैं इसके पीछे के कारण और आगे की राह?

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया सोमवार को पहली बार 95 का स्तर पार कर गया। अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और विदेशी निवेशकों की निकासी जारी रहती है तो रुपया 98 के स्तर को भी छू सकता है।

Tue, 31 March 2026 06:39 AMDrigraj Madheshia मिंट
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रुपये में ऐतिहासिक गिरावट: क्या हैं इसके पीछे के कारण और आगे की राह?

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया सोमवार को पहली बार 95 का स्तर पार कर गया। हालांकि, बाद में यह कुछ संभला और अंत में 94.78 (अस्थायी) प्रति डॉलर पर रहा। एक महीने में रुपया करीब चार फीसदी गिर चुका है। वहीं, इस वित्त वर्ष में रुपया 11% से ज्यादा टूट चुका है। वित्त वर्ष 2013 के बाद रुपये का यह सबसे खराब प्रदर्शन है। इससे कारोबारियों और निवेशकों की चिंता बढ़ती जा रही है।

विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार, पश्चिम एशिया संघर्ष के 31वें दिन में प्रवेश करने से बाजारों में अनिश्चितता बनी रही और रुपये में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया। सोमवार के कारोबारी सत्र में रुपये में 165 पैसे का भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला।

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शुरुआत रुपया 93.62 प्रति डॉलर पर खुला और फिर मजबूत होकर 93.57 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। यह पिछले बंद स्तर के मुकाबले 1.28 रुपये की बढ़त थी। यह मजबूती इसलिए आई, क्योंकि आरबीआई ने बैंकों के लिए एक दिन के लिए रखी जाने वाली 'नेट ओपन पोजिशन' की सीमा घटाकर 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर कर दी।

हालांकि, बाद में रुपया अपनी यह गति बरकरार नहीं रख सका और डॉलर के मुकाबले गिरकर ऑल टाइम लो 95.22 पर आ गया। अंत में रुपया 94.78 (अस्थायी) प्रति डॉलर पर रहा, जो पिछले बंद भाव 94.85 से सात पैसे अधिक है।

सबसे बड़ी गिरावट

भारतीय रुपया वित्त वर्ष 2013-14 के आर्थिक संकट के बाद अपनी सबसे बड़ी गिरावट का सामना कर रहा है। उस दौरान रुपया पूरे वित्त वर्ष के दौरान 10.6 रुपये के करीब लुढ़का था, जबकि चालू वित्त में यह गिरावट 11 रुपये तक पहुंच गई है। रुपये पर दबाव बढ़ने के पीछे कई कारण हैं।

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इनमें सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, विदेशी निवेश का भारत से बाहर जाना, बढ़ता व्यापार घाटा और सोने का ज्यादा आयात शामिल है। साथ ही गिरावट का एक कारण यह भी है कि आरबीआई अब रुपये को एक निश्चित स्तर पर रोकने की बजाय धीरे-धीरे कमजोर होने दे रहा है ताकि विदेशी मुद्रा भंडार पर ज्यादा दबाव न पड़े।

आगे क्या होगा

हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक स्थिति को संभालने के लिए कदम उठा रहा है, लेकिन तेल की बढ़ती कीमतें, विदेशी निवेश की निकासी और व्यापार घाटा रुपये पर दबाव बनाए हुए हैं। इससे यह भी संकेत मिल रहे हैं कि बाजार में भारी अस्थिरता है और निवेशकों का भरोसा डगमगा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और विदेशी निवेशकों की निकासी जारी रहती है तो रुपया 98 के स्तर को भी छू सकता है। लेकिन अगर तेल की कीमतें कम होती हैं और विदेशी निवेश वापस आता है, तो रुपये में सुधार भी हो सकता है।

आरबीआई ने क्या कदम उठाए

विशेषज्ञों का कहना है कि स्थिति चिंताजनक जरूर है, लेकिन 2013 जैसा बड़ा आर्थिक संकट अभी नहीं है। आरबीआई अब पहले की तरह रुपये को बचाने के लिए बहुत ज्यादा डॉलर नहीं बेच रहा है, बल्कि वह धीरे-धीरे रुपये को कमजोर होने दे रहा है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रहे और अगर संकट लंबा चले तो देश के पास डॉलर की कमी न हो।

आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेनगुप्ता ने कहा कि आरबीआई विदेशी मुद्रा भंडार को बचाकर रखना चाहेगा, क्योंकि 2013 में जब हम संकट में आए थे, तो हमारा मुद्रा भंडार काफी घट गया है और नाजुक हो गई थी।

अन्य मुद्राओं के मुकाबले बेहतर स्थिति

आरबीआई की कदम की वजह से, एक महीने के युद्ध के दौरान रुपये का प्रदर्शन अन्य उभरते बाजार देशों की तुलना में सबसे खराब नहीं रहा। 27 फरवरी के बाद की मुद्रा चाल के विश्लेषण से पता चलता है कि रुपया जरूर गिरा, लेकिन थाई बाहट, फिलीपींस पेसो और मैक्सिकन पेसो जैसी मुद्राएं उससे ज्यादा गिरीं।

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यह स्थिति युद्ध से पहले अलग थी, जब रुपया सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा था। फिर भी मार्च में रुपये की गिरावट तेज रही। आरबीआई के नियंत्रण उपायों से पहले यह 4% से ज्यादा गिरा था, जो बाद में घटकर 2.7% रह गया लेकिन युद्ध की स्थिति को देखते हुए यह अप्रत्याशित नहीं था।

एक महीने में करीब 50 हजार करोड़ का बोझ

रुपये की कमजोरी का सबसे सीधा असर आयात पर पड़ता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा-खासकर कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान और मशीनरी-विदेशों से मंगाता है। अनुमान है कि ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक भारत का आयात बिल 50 हजार करोड रुपये से अधिक बढ़ चुका है।

अगर यु्द्ध लंबा चलता है तो भारत पर करीब चार लाख करोड़ का अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा। इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है, जिससे परिवहन महंगा होगा और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका है।

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