RBI Monetary Policy: आपके लोन की EMI कम होगी या बढ़ेगी, बुधवार को बताएगा RBI
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और पश्चिम एशिया संकट के बीच इस बार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ब्याज दरों में कटौती से बच सकता है। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि मौद्रिक नीति समिति (MPC) अपनी आगामी बैठक में रेपो रेट को फिलहाल स्थिर रख सकती है।
RBI Monetary Policy 2026: कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और पश्चिम एशिया संकट के बीच इस बार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ब्याज दरों में कटौती से बच सकता है। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि मौद्रिक नीति समिति (MPC) अपनी आगामी बैठक में रेपो रेट को फिलहाल स्थिर रख सकती है। इसका सीधा असर होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की EMI पर पड़ेगा।
कब होगी RBI की बैठक और क्या है उम्मीद?
RBI की MPC बैठक सोमवार से शुरू हो गई है और बुधवार को नतीजे घोषित किए जाएंगे। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि रेपो रेट 5.25% पर ही बरकरार रह सकता है। इसकी मुख्य वजह , वैश्विक अनिश्चितता, रुपये में उतार-चढ़ाव और बढ़ती महंगाई का खतरा है। एसबीआई के मुख्य अर्थशास्त्री सौम्य कांति घोष ने कहा कि भारत मौजूदा संकट से अछूता नहीं है। रुपया पहले ही 93 प्रति डॉलर के ऊपर बना हुआ है और कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर है, जिससे मुद्रास्फीति बढ़ी है।
रेपो रेट क्या है?
रेपो रेट वह ब्याज दर है, जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) कमर्शियल बैंकों को थोड़े समय के लिए लोन देता है। बैंक इसी दर को आधार बनाकर अपने ग्राहकों को दिए जाने वाले लोन की ब्याज दर तय करते हैं।
रिवर्स रेपो रेट क्या है: इसके विपरीत, रिवर्स रेपो रेट वह दर है जिस पर बैंक अपनी अतिरिक्त राशि RBI के पास जमा करते हैं और बदले में ब्याज प्राप्त करते हैं।
रेपो रेट बढ़ने से लोन महंगा क्यों हो जाता है
जब RBI रेपो रेट बढ़ाता है, तो बैंकों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है। इस अतिरिक्त लागत को संतुलित करने के लिए बैंक आमतौर पर लोन की ब्याज दरें बढ़ा देते हैं, जिससे आम लोगों के लिए कर्ज महंगा हो जाता है।
RBI रेपो रेट का उपयोग महंगाई को नियंत्रित करने के एक प्रभावी उपकरण के रूप में करता है। जब बाजार में महंगाई तेजी से बढ़ती है, तो रेपो रेट बढ़ाकर लोन महंगा किया जाता है, जिससे लोगों की खर्च करने की क्षमता कम होती है और मांग में कमी आती है। इससे महंगाई पर नियंत्रण पाने में मदद मिलती है।
तेल की कीमतें बनी सबसे बड़ी चिंता का सबब
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुकी हैं। भारत अपनी जरूरत का करीब 80% तेल आयात करता है। इससे आयात बिल और महंगाई दोनों बढ़ रहे हैं। इसका असर ये है कि ट्रांसपोर्ट महंगा हो रहा है। रोजमर्रा के सामान की कीमतों में बढ़ोतरी है। दूसरी ओर फरवरी 2026 में खुदरा महंगाई दर 3.21% तक पहुंच गई, जो 10 महीने का उच्च स्तर है।
क्या है अनुमान: चालू वित्त वर्ष में औसत महंगाई 4.4% रहने का अनुमान है। पहले यह करीब 2% के आसपास थी। यानी महंगाई फिर से RBI के लिए चिंता का विषय बन रही है।
क्या आगे बढ़ सकती हैं ब्याज दरें: विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और महंगाई बढ़ती है तो RBI भविष्य में ब्याज दर बढ़ाने पर भी विचार कर सकता है। फिलहाल, केंद्रीय बैंक “वेट एंड वॉच” की रणनीति अपना सकता है।
ग्रोथ vs महंगाई: RBI की बड़ी चुनौती: पिछले एक साल में RBI ने अर्थव्यवस्था को सपोर्ट देने के लिए रेपो रेट में 1.25% की कटौती की थी, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। महंगाई बढ़ रही है और ग्लोबल रिस्क बढ़ गए हैं। ऐसे में RBI को ग्रोथ और महंगाई के बीच संतुलन बनाना होगा।
सस्ता लोन अभी मुश्किल: तेल की बढ़ती कीमतों और महंगाई के खतरे को देखते हुए फिलहाल ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कम है। आने वाले महीनों में EMI सस्ती होने की बजाय स्थिर या महंगी भी हो सकती है।




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