पेट्रोल-डीजल के बढ़ेंगे दाम? IMF ने कहा- ग्राहकों पर बोझ डालना जरूरी
IMF चाहता है कि कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतों का बोझ उपभोक्ताओं पर डाला जाए। वहीं, फिच रेटिंग का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बने रहने और घरेलू ईंधन कीमतों में समय पर वृद्धि नहीं होने की स्थिति में भारत की तेल कंपनियों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।

विधानसभा चुनाव के खत्म होने के बाद अब एक बार फिर से ये चर्चा तेज हो गई है कि सरकार पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ा सकती है। हालांकि, सरकार ने बीते कुछ दिनों में कई बार अटकलों को गलत बताया है लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) चाहता है कि कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतों का बोझ उपभोक्ताओं पर डाला जाए। दरअसल, ईरान-अमेरिका और इजरायल जंग के कारण कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। इस उछाल के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम स्थिर हैं। इससे सरकारी तेल कंपनियों को लगातार बढ़ते नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
बता दें कि न्यूज एजेंसी PTI ने कुछ दिन पहले सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया था कि निकट भविष्य में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इस बीच, सरकारी तेल कंपनियों ने लागत के अनुरूप कमर्शियल LPG, इंडस्ट्रियल डीजल, 5-किलो वाली LPG और अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस को बेचे जाने वाले जेट फ्यूल की कीमतें बढ़ा दी हैं।
IMF का क्या है तर्क?
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने तर्क दिया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने के कारण पैदा हुए मौजूदा ऊर्जा संकट से निपटने के लिए भारत के पास अभी भी गुंजाइश मौजूद है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, NCAER द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में IMF के एशिया-प्रशांत निदेशक कृष्णा श्रीनिवासन ने कहा- सरकार ने तेल पर उत्पाद शुल्क में कटौती की है। वे उर्वरक पर कुछ सब्सिडी भी देते हैं। यह कुछ समय तक तो जारी रह सकता है लेकिन राजकोषीय गुंजाइश के मामले में इसकी सीमा बहुत ज्यादा नहीं है। किसी न किसी मोड़ पर आपको कीमतें बढ़ानी ही होंगी। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि कीमतें बढ़ने से मांग पर लगाम लगेगी, ठीक ऐसे समय में जब कई देश आपूर्ति से जुड़ी बाधाओं का सामना कर रहे हैं।
दरअसल, IMF का नजरिया आर्थिक बुनियादी बातों पर आधारित है। उसका मानना है कि दुनिया भर में सप्लाई और डिमांड में संतुलन बनाने के लिए ईंधन की कीमतें बढ़ने देना जरूरी है। IMF के रोड्रिगो वाल्डेस का कहना है कि हमारे पास तेल नहीं है। हमारे पास एनर्जी नहीं है। एनर्जी सभी के लिए अधिक महंगी होनी चाहिए ताकि हम उसका इस्तेमाल कम करें। यह एक ग्लोबल झटका है, और अगर देश कीमतों के संकेतों को दबाते हैं, तो ग्लोबल कीमतें और बढ़ जाएंगी।
फिच रेटिंग का अलर्ट
हाल ही में फिच रेटिंग ने भी तेल कंपनियों को लेकर एक अलर्ट जारी किया था। फिच का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बने रहने और घरेलू ईंधन कीमतों में समय पर वृद्धि नहीं होने की स्थिति में भारत की तेल कंपनियों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। इससे उनकी कमाई और कैश फ्लो भी प्रभावित होगा। रेटिंग एजेंसी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि कच्चे तेल की ऊंची लागत के अनुरूप पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि नहीं होने पर तेल कंपनियों की एबिटा तेजी से घट सकती है।




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