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न्यू लेबर कोड का असर, 13 तिमाहियों में पहली बार निफ्टी की कंपनियों के मुनाफे में गिरावट

दिसंबर तिमाही के दौरान कंपनियों के मार्जिन पर न्यू लेबर कोड लागू होने का असर पड़ा। इस कोड के तहत मूल वेतन (बेसिक सैलरी) को कुल कॉस्ट टू कंपनी (सीटीसी) का 50 प्रतिशत करना अनिवार्य हो गया है, जिससे कई कंपनियों की ग्रेच्युटी लागत बढ़ गई।

Fri, 20 Feb 2026 09:06 AMDrigraj Madheshia लाइव हिन्दुस्तान
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न्यू लेबर कोड का असर, 13 तिमाहियों में पहली बार निफ्टी की कंपनियों के मुनाफे में गिरावट

दिसंबर तिमाही के नतीजों में निफ्टी 50 की कंपनियों को पिछले 13 तिमाहियों में पहली बार मुनाफे में गिरावट का सामना करना पड़ा है। न्यू लेबर कोड के लागू होने के चलते 37 कंपनियों का कुल नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 8.1 प्रतिशत घट गया। सितंबर 2022 तिमाही के बाद यह पहला मौका है जब मुनाफा नकारात्मक दर्ज किया गया है।

हालांकि, अच्छी बात यह रही कि कंपनियों की टॉपलाइन में बढ़ोतरी हुई है। इस तिमाही में रेवेन्यू में 10 प्रतिशत की ग्रोथ रेट से दर्ज की गई, जो मार्च 2023 तिमाही के बाद पहला दोहरे अंकों का आंकड़ा है। वहीं, ऑपेरेशनल मुनाफा सालाना आधार पर 7.5 प्रतिशत बढ़ा, जो पिछली तिमाही के 6.1 प्रतिशत और एक साल पहले की समान अवधि के 5 प्रतिशत से बेहतर है। यह विश्लेषण बैंक, वित्तीय सेवा और तेल-गैस कंपनियों को छोड़कर किया गया है, क्योंकि इनके रेवेन्यू मॉडल अलग होते हैं।

खपत में सुधार के संकेत, ऑटो सेक्टर ने दिखाई बढ़त

विश्लेषकों के मुताबिक, खपत में सुधार के संकेत मिल रहे हैं। वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में रेवेन्यू ग्रोथ रेट क्रमिक रूप से 16 प्रतिशत से बढ़कर 20 प्रतिशत हो गई, जो जीएसटी कटौती के बाद पहली तिमाही है। इस विस्तार में ऑटो सेक्टर सबसे आगे रहा, जहां ग्रोथ रेट 14 प्रतिशत से बढ़कर 21 प्रतिशत हो गई।

वहीं, एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) की वृद्धि लगभग 13 प्रतिशत पर स्थिर रही। ज्वैलरी सेगमेंट में सोने की बढ़ती कीमतों के कारण रफ्तार देखी गई। रिटेल की वृद्धि सपाट रही, जबकि होटल और क्विक-सर्विस रेस्टोरेंट (क्यूएसआर) सेगमेंट स्थिर हुए हैं।

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न्यू लेबर कोड से मार्जिन पर दबाव

तिमाही के दौरान कंपनियों के मार्जिन पर न्यू लेबर कोड लागू होने का असर पड़ा। इस कोड के तहत मूल वेतन (बेसिक सैलरी) को कुल कॉस्ट टू कंपनी (सीटीसी) का 50 प्रतिशत करना अनिवार्य हो गया है, जिससे कई कंपनियों की ग्रेच्युटी लागत बढ़ गई। विश्लेषकों का अनुमान है कि तिमाही के दौरान कुल मुनाफे (पैट) पर इसका करीब 5 प्रतिशत का असर पड़ा।

टेक्नोलॉजी सेक्टर को 13 प्रतिशत और डिस्क्रेशनरी सेक्टर को 6.5 प्रतिशत का झटका लगा। इसे एकमुश्त और नॉन-कैश चार्ज बताया जा रहा है, जिसने रिपोर्टेड कमाई को प्रभावित किया। अगर श्रम संहिता के इस असर को हटा दिया जाए, तो नेगेटिव सरप्राइज का हिस्सा 47 प्रतिशत से घटकर 27 प्रतिशत रह जाता।

कमाई पर किसका रहा सबसे ज्यादा असर?

मनीकंट्रोल की खबर के मुताबिक सालाना आधार पर कमाई में हुए इजाफे में टाटा स्टील, टीसीएस और भारती एयरटेल का योगदान 78 प्रतिशत रहा। वहीं, टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल, सिप्ला और इंडिगो (इंटरग्लोब एविएशन) की कमाई ने समग्र आय पर नकारात्मक असर डाला। इंडेक्स में शामिल कंपनियों में से 10 कंपनियों का मुनाफा उम्मीद से कम रहा, 14 कंपनियों ने अनुमान से बेहतर प्रदर्शन किया और 26 के नतीजे अनुमान के अनुरूप रहे।

चार कंपनियों (बीईएल, पावर ग्रिड, सन फार्मा और अल्ट्राटेक सीमेंट) ने ईबीआईटीडीए (परिचालन मुनाफा) के मामले में विश्लेषकों के अनुमान को 5 प्रतिशत से अधिक पीछे छोड़ दिया। वहीं, दो कंपनियां (सिप्ला और कोल इंडिया) अनुमान से 5 प्रतिशत से अधिक चूक गईं। सिप्ला पर अमेरिका में कम बिक्री का दबाव रहा, जबकि कोल इंडिया पर कर्मचारी लागत अधिक आने का असर पड़ा।

नेट इनकम के स्तर पर एटरनल, जेएसडब्ल्यू स्टील, सन फार्मा, टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल, कुछ टाटा समूह की कंपनियां और अल्ट्राटेक सीमेंट ने बेहतर प्रदर्शन किया। वहीं, सिप्ला, मारुति सुजुकी और विप्रो अनुमान से कम रहीं।

बीएसई 500 कंपनियों का हाल

बीएसई 500 कंपनियों के लिए, श्रम संहिता के प्रभाव के बावजूद, समग्र कमाई मजबूत रही। बीएसई 500 ने सालाना आधार पर 16 प्रतिशत नेट प्रॉफिट ग्रोथ रही। इसमें एनर्जी सेक्टर (40 प्रतिशत) और डिस्क्रेशनरी सेक्टर (26 प्रतिशत) सबसे आगे रहे, जबकि टेक्नोलॉजी सेक्टर (7 प्रतिशत) पीछे रहा। बीएसई 500 का ईबीआईटीडीए मार्जिन तिमाही दर तिमाही 35 आधार अंक घटा है।

बीएसई 500 कंपनियों की आय (टॉपलाइन) में आठ तिमाहियों में पहली बार दोहरे अंकों में वृद्धि हुई है, जिसे खपत के रुझानों का सहारा मिला। 25 प्रतिशत से अधिक नेट प्रॉफिट ग्रोथ देने वाली कंपनियों की हिस्सेदारी तीसरी तिमाही में बढ़कर 37 प्रतिशत हो गई, जो दूसरी तिमाही में 35 प्रतिशत थी। वहीं, नकारात्मक ग्रोथ रिपोर्ट करने वाली कंपनियों का हिस्सा 33 प्रतिशत से घटकर 26 प्रतिशत रह गया। विश्लेषकों का कहना है कि ये रुझान खपत-आधारित कमाई में सुधार (रिकवरी) के संकेत दे रहे हैं।

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