भारतीय किसानों पर कितना असर डाल सकता है जंग, खादों के उत्पादन पर संकट के बादल
Iran-Israel War Impacts: भारत उर्वरकों, कच्चे माल और गैस का आयात सऊदी अरब, मोरक्को, जॉर्डन और ओमान सहित कई पश्चिम एशियाई देशों से करता है। डीएपी के एक बड़े निर्यातक चीन ने पहले ही इसका निर्यात बंद कर रखा है।

Iran-Israel War Impacts: ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जारी युद्ध का असर भारत में उर्वरक उत्पादन पर दिखने लगा है। हालांकि फिलहाल यूरिया और डाई अमोनियम फॉस्फेट (DAP) सहित अधिकांश खादों का स्टॉक पिछले साल से बेहतर स्थिति में है, लेकिन अगर यह युद्ध एक सप्ताह और खिंचता है तो देश में उर्वरक संकट पैदा होने की आशंका है। उर्वरकों और उनके कच्चे माल गैस, पोटाश तथा फॉस्फेट के मामले में भारत की सबसे अधिक निर्भरता खाड़ी देशों पर है और फिलहाल वहां से इनका आयात पूरी तरह ठप हो गया है।
गैस सप्लाई में कमी से उत्पादन प्रभावित
युद्ध के कारण गैस की सप्लाई में दस प्रतिशत से अधिक की कमी आई है, जिसका सीधा असर यूरिया उत्पादन पर पड़ा है। कई उत्पादन संयंत्रों ने अपने उत्पादन में सात से आठ फीसदी तक की कटौती की है। रूरल वॉयस ने उद्योग सूत्रों के हवाले से बताया है कि यह कटौती फिलहाल बड़ी चिंता का विषय नहीं है, लेकिन अगर युद्ध लंबा चलता है तो स्थिति गंभीर हो सकती है। गैस की कमी से न केवल उत्पादन प्रभावित हो रहा है बल्कि आने वाले दिनों में उर्वरकों की उपलब्धता पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।
मौजूदा स्टॉक में राहत की उम्मीद
उद्योग सूत्रों ने बताया कि फिलहाल किसी प्रकार के संकट की स्थिति नहीं है और इसकी मुख्य वजह फरवरी 2026 के अंत में उर्वरकों का स्टॉक फरवरी 2025 से अधिक होना है। चालू साल में पिछले साल के मुकाबले अधिकांश उर्वरकों की खपत बढ़ी है, लेकिन उसके बावजूद फरवरी के अंत में स्टॉक पिछले वर्ष से बेहतर स्थिति में है।
विभिन्न उर्वरकों के स्टॉक की स्थिति
फरवरी 2026 के अंत में देश में यूरिया का स्टॉक 55 लाख टन रहा, जबकि पिछले साल इसी समय यह 49 लाख टन था। डीएपी के मामले में स्थिति और भी बेहतर है, जहां चालू साल में फरवरी के अंत में स्टॉक 25 लाख टन रहा, जबकि पिछले साल यह 13 लाख टन ही था। म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) के मामले में स्थिति कुछ अलग है, जहां स्टॉक 12.92 लाख टन रहा जो पिछले साल 15 लाख टन था।
कॉम्प्लेक्स उर्वरकों में एनपीके की स्थिति भी संतोषजनक है। फरवरी 2026 के अंत में एनपीके का स्टॉक 54 लाख टन रहा, जबकि पिछले साल यह 32 लाख टन ही था। सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) का स्टॉक भी इस साल फरवरी में 32 लाख टन रहा, जो पिछले साल 22 लाख टन था।
बढ़ती खपत के बावजूद राहत
यह स्थिति तब है जब चालू साल में उर्वरकों की बिक्री में जबरदस्त वृद्धि दर्ज की गई है। यूरिया की बिक्री में नौ फीसदी, डीएपी की बिक्री में 21 फीसदी और एनपीके की बिक्री में पिछले साल के मुकाबले 11.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। बढ़ती खपत के बावजूद स्टॉक का बेहतर होना कुछ हद तक राहत देने वाली बात है।
वैश्विक बाजार में बढ़ी कीमतें
पिछले कुछ दिनों में वैश्विक बाजार में डीएपी की कीमतों में तेजी आनी शुरू हो गई थी और युद्ध शुरू होने से पहले यह 740 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई थी। भारत उर्वरकों, कच्चे माल और गैस का आयात सऊदी अरब, मोरक्को, जॉर्डन और ओमान सहित कई पश्चिम एशियाई देशों से करता है। डीएपी के एक बड़े निर्यातक चीन ने पहले ही इसका निर्यात बंद कर रखा है।
आयात समझौतों पर संकट के बादल
भारत ने सऊदी अरब की उर्वरक कंपनी मादेन के साथ डीएपी की दीर्घकालिक आपूर्ति का करार किया है, लेकिन मौजूदा परिस्थिति में यह आयात संभव नहीं हो पा रहा है। रूस के साथ भी लंबी अवधिक का करार हुआ है, लेकिन वहां से सप्लाई अप्रैल के मध्य में ही शुरू हो पाएगी। उद्योग जानकारों के मुताबिक इस युद्ध के चलते उर्वरकों की कीमतों में तेजी आना तय है, जिससे किसानों को कीमत वृद्धि से बचाने के लिए सरकार को अधिक उर्वरक सब्सिडी देनी होगी।
भारत में उर्वरकों की कुल खपत
देश में उर्वरकों की करीब 650 लाख टन की सालाना खपत होती है, जिसमें चालू साल में यूरिया की खपत 400 लाख टन के आसपास रहने का अनुमान है। डीएपी की खपत करीब 100 लाख टन रहती है, जबकि बाकी मात्रा अन्य कॉम्प्लेक्स व उर्वरकों की है।
आगे की राह और चुनौतियां
उर्वरक उद्योग इस परिस्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और सूत्रों के मुताबिक अगले एक सप्ताह से दस दिन काफी अहम साबित होंगे। इसके बाद ही स्थिति स्पष्ट हो पाएगी। करीब चार साल पहले फरवरी में रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले के बाद उर्वरकों की कीमतों में भारी तेजी आई थी, जिसके चलते सरकार को उर्वरक सब्सिडी में बढ़ोतरी करनी पड़ी थी, लेकिन इस बार केवल कीमतों का मामला नहीं है, बल्कि अगर यह युद्ध जारी रहता है तो समय पर आयात को लेकर एक बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।




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