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अडानी की अमेरिकी फेडरल कोर्ट से अपील, खारिज करें केस, जानें क्या दी दलील

अडानी की ओर से सबसे बड़ी दलील यह है कि इस मामले में अमेरिकी कोर्ट का अधिकार क्षेत्र ही नहीं बनता।  कथित लेन-देन अमेरिका के बाहर हुआ, बॉन्ड किसी अमेरिकी एक्सचेंज में लिस्डेट नहीं थे। इस मामले को अमेरिकी कानून के तहत नहीं सुना जाना चाहिए।

Wed, 8 April 2026 06:48 AMDrigraj Madheshia लाइव हिन्दुस्तान
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अडानी की अमेरिकी फेडरल कोर्ट से अपील, खारिज करें केस, जानें क्या दी दलील

गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी ने यूएस सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमिशन (SEC) के खिलाफ चल रहे मुकदमे को खारिज करने के लिए न्यूयॉर्क की फेडरल कोर्ट में याचिका दायर की है। अडानी की ओर से सबसे बड़ी दलील यह है कि इस मामले में अमेरिकी अदालत का अधिकार क्षेत्र ही नहीं बनता। वकीलों के मुताबिक, कथित लेन-देन अमेरिका के बाहर हुआ, बॉन्ड किसी अमेरिकी एक्सचेंज में लिस्डेट नहीं थे और दोनों आरोपी भारत में रहते हैं, इसलिए इस मामले को अमेरिकी कानून के तहत नहीं सुना जाना चाहिए।

750 मिलियन डॉलर के बॉन्ड पर उठे सवाल

PTI के मुताबिक अडानी ग्रुप की ओर से कहा गया है कि जिस 750 मिलियन डॉलर के बॉन्ड को लेकर मामला बनाया गया है, वह नियम 144A के तहत जारी किया गया था। यह बॉन्ड पहले गैर-अमेरिकी अंडरराइटर्स को बेचा गया और बाद में कुछ हिस्से को संस्थागत खरीदारों को रीसेल किया गया। रॉयटर्स के मुताबिक अडानी पक्ष का दावा है कि इस प्रक्रिया में अमेरिका की सीधी भागीदारी नहीं थी, इसलिए SEC का हस्तक्षेप उचित नहीं है।

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निवेशकों को नुकसान नहीं, केस कमजोर

अडानी की याचिका में यह भी कहा गया है कि SEC अब तक यह साबित नहीं कर पाया है कि किसी भी निवेशक को इस सौदे से आर्थिक नुकसान हुआ हो। कंपनी के अनुसार, ये बॉन्ड 2024 में मैच्योर हो चुके हैं और निवेशकों को मूलधन के साथ ब्याज भी पूरा लौटाया जा चुका है। ऐसे में “नो लॉस” की स्थिति में मुकदमे की वैधता पर सवाल उठता है।

रिश्वतखोरी के आरोपों को किया खारिज

अडानी ने रिश्वतखोरी के आरोपों को भी निराधार बताया है। उनका कहना है कि SEC के पास इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस या विश्वसनीय सबूत नहीं है। साथ ही यह भी कहा गया कि न तो गौतम अडानी और न ही सागर अडानी का इस बॉन्ड इश्यू से कोई प्रत्यक्ष संबंध साबित किया गया है।

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‘भ्रामक बयान’ नहीं, सामान्य कॉर्पोरेट भाषा

SEC ने जिन बयानों को भ्रामक बताया है, जैसे ESG प्रतिबद्धताएं और कॉर्पोरेट गवर्नेंस, उन्हें अडानी पक्ष ने “पफरी” यानी सामान्य कॉर्पोरेट बयान करार दिया है। उनका तर्क है कि ऐसे सामान्य दावे निवेशकों को गुमराह करने की श्रेणी में नहीं आते और इन्हें कानूनी आधार नहीं बनाया जा सकता।

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अडानी ग्रुप ने इस पूरे मामले को कानूनी रूप से कमजोर बताते हुए कोर्ट से इसे खारिज करने की मांग की है। अब देखना होगा कि अमेरिकी अदालत इस पर क्या रुख अपनाती है, क्योंकि यह मामला अंतरराष्ट्रीय निवेश और नियामक अधिकार क्षेत्र से जुड़ा बड़ा उदाहरण बन सकता है।

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