बिहार में हर साल क्यों कम हो रही मानसून की बारिश, हेल्थ और किसानों पर असर
मानसून सीजन में मानक के अनुसार 992.2 मिमी बारिश होनी थी पर मात्र 686.3 प्रतिशत ही बारिश हुई। इससे पहले बिहार में 2024 में 20%, 2023 में 25% और 2022 में 31% कम बारिश दर्ज की गई थी। इसके अलावा शीतकालीन बारिश में कमी की भी स्थिति सूबे में बनी हुई है।

बिहार में साल दर साल मानसून की बारिश मानक से कम होती जा रही है। मौसम विभाग की ओर से वर्ष 2019 में मानक बारिश के आंकड़े घटाने के बावजूद इसकी मात्रा में भारी कमी आई है। वर्ष 2018 तक सूबे में बारिश का सामान्य मानक 1027.6 मिमी था, लेकिन बादलों के स्वभाव में बदलाव से इसे घटा दिया गया। इसके बावजूद बारिश की किल्लत बनी ही रही। नतीजतन अधिकतम तापमान में बढ़ोतरी से गर्मी बढ़ी है। बारिश की कमी से राज्य की खेती- किसानी, मानव स्वास्थ्य और घरेलू बजट पर सीधा असर पड़ रहा है।
मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच सालों में राज्य में चार साल मानसून की बारिश सामान्य से बेहद कम रही। 2025 में 31% कम बारिश दर्ज की गई। मानसून सीजन में मानक के अनुसार 992.2 मिमी बारिश होनी थी पर मात्र 686.3 प्रतिशत ही बारिश हुई। इससे पहले बिहार में 2024 में 20%, 2023 में 25% और 2022 में 31% कम बारिश दर्ज की गई थी। इसके अलावा शीतकालीन बारिश में कमी की भी स्थिति सूबे में बनी हुई है।
जलवायु विशेषज्ञ डॉ. प्रधान पार्थ सारथी बताते हैं कि राज्य में बारिश का पैटर्न प्रभावित हो रहा है। असामान्य बारिश, कुछ इलाकों में अधिक बारिश, कम समय में अधिक मात्रा में बारिश और मानक से बेहद कम बारिश जैसे परिणाम पिछले कुछ सालों में दिखे हैं। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बारिश की कमी के रूप में एक अहम कारक है। पिछले कुछ सालों में मानसून ट्रफ लाइन बिहार व इसके आसपास कम रह रहा है।
यह ओडिशा और मध्यप्रदेश की ओर पिछले कई दिनों तक टिका रहता है। मानसून की बारिश ट्रफ के आसपास ही होती है। यह जिस ओर होती है उधर बारिश ज्यादा होती है। मौसमविदों का कहना है कि यदि मानसून ट्रफ की वजह से अगर बारिश की कमी रहती है तो बंगाल की खाड़ी में बना मानसून डिप्रेशन इस क्षेत्र में लो प्रेशर एरिया बनाता है। पिछले कुछ सालों से बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का क्ष्रेत्र बनना कम हुआ है। इसका संयुक्त असर बारिश के पैटर्न पर पड़ा है।




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