When JP folded his hands apologized to Shivanand Tivary even father was his disciple ...जब जेपी ने शिवानंद तिवारी से हाथ जोड़कर मांगी थी माफी, जबकि पापा भी थे जयप्रकाश नारायण केशिष्य, Bihar Hindi News - Hindustan
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...जब जेपी ने शिवानंद तिवारी से हाथ जोड़कर मांगी थी माफी, जबकि पापा भी थे जयप्रकाश नारायण के शिष्य

शिवानंद तिवारी ने कहा कि जेपी की महानता का उनका यह पहला अनुभव था। इतना बड़ा आदमी, जिनके सामने देश झुकता था, उन्होंने अपने ही एक शिष्य के बेटे से हाथ जोड़कर माफी मांगी। यह जेपी की महानता थी।

Fri, 22 May 2026 09:55 AMJayesh Jetawat लाइव हिन्दुस्तान, पटना
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...जब जेपी ने शिवानंद तिवारी से हाथ जोड़कर मांगी थी माफी, जबकि पापा भी थे जयप्रकाश नारायण के शिष्य

बिहार के पूर्व मंत्री एवं दिग्गज समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने लोक नायक जय प्रकाश नारायण उर्फ जेपी से जुड़ा एक किस्सा साझा किया है। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और लालू यादव के करीबी रह चुके शिवानंद ने बताया कि एक बार जेपी ने उनसे हाथ जोड़कर माफी मांगी थी। यह उनकी महानता का प्रतीक था। शिवानंद के अनुसार, उनके पिता जेपी के शिष्य रहे थे। जेपी के सामने कोई साधारण व्यक्ति भी जाता तो उसे महत्वपूर्ण एहसास होता था।

शिवानंद तिवारी ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, "राजनीति की शुरुआत तो मैंने लोहियावादी के रूप में की थी। लेकिन मेरी पीढ़ी के तमाम लोग, जो बिहार की राजनीति के शीर्ष पर लंबे समय तक कायम रहे और आज भी कायम हैं, उन सबको जयप्रकाश के आंदोलन ने ही एक उछाल दिया था। बल्कि कहा जाए तो उस आंदोलन ने ही उनको नेता बनाया। बिहार की राजनीति में जो सड़ांध दिखाई दे रही है, उसके पीछे यह भी एक कारण है कि पिछले 50 सालों से जन सवालों पर कोई व्यापक जन संघर्ष नहीं हुआ। इसलिए राजनीति की सफाई नहीं हुई। 50 सालों से बिहार की राजनीति एक ही पटरी पर चल रही है। यही कारण है कि यहां की राजनीति में अनेक विकृतियां पैदा होती चली गईं।"

उन्होंने कहा, "मैंने लोहिया जी को भी देखा और उन्हें समझने का थोड़ा-बहुत प्रयास किया। विचारक और राजनीतिक दार्शनिक के रूप में लोहिया जी शिखर पुरुष दिखाई देते हैं। लेकिन एक व्यक्ति और नेता के रूप में जयप्रकाश जी का कोई जवाब नहीं था। उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि मेरे जैसा साधारण आदमी भी उनके सामने जाता था तो अपने आपको बड़ा महसूस करने लगता था।"

शिवानंद ने कुछ घटनाओं का जिक्र अपने पोस्ट में किया है। उन्होंने कहा, "पहली घटना तो बहुत लोग जानते हैं। 18 मार्च 1974 की रात गिरफ्तारी के डर से दो-तीन साथी श्रीकृष्ण पुरी वाले मेरे घर पर ही सोए। 19 मार्च की सुबह, भवेश चंद्र प्रसाद हम लोगों को लेकर जयप्रकाश जी से मिलाने गए। भवेश जी बाद में संघर्ष कार्यालय के कार्यालय मंत्री बने और विधायक भी हुए। उन दिनों वे भूदान यज्ञ कमिटी के सचिव थे और आंदोलनकारी नेतृत्व और जयप्रकाश जी के बीच सेतु का काम कर रहे थे।"

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उन्होंने आगे बताया, "हम लोग पहले राजेंद्र नगर विद्यार्थी परिषद के कार्यालय गए और वहां से जेपी के यहां पहुंचे। भवेश जी सबका परिचय करा रहे थे। जब मेरी बारी आई तो मैंने भोजपुरी में ही कहा- “हम शिवानंद हईं।” मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि मेरे पिता को समाजवादी के रूप में दीक्षित करने वाले स्वयं जेपी ही थे। पिताजी उन्हें ही अपना नेता मानते थे, इसलिए मुझे लगा कि ये तो मेरे घर के बुजुर्ग हैं। इन्हें अपना परिचय मुझे खुद देना चाहिए।"

शिवानंद तिवारी ने बताया, "जैसे ही उन्होंने मेरा नाम सुना, उनकी भौंहें तन गई। जेपी ने दुबारा पूछा-के ? मैंने दुबारा अपना परिचय दिया। उन्होंने भोजपुरी में ही मुझसे पूछा — तूं एह लोग के साथे कईसे? इस सवाल के बाद तो पूछिए मत! भीतर से मैंने बहुत अपमानित महसूस किया। मैंने भोजपुरी में ही जवाब दिया- सुना कि आपकी तबीयत खराब है। इसलिए आपको देखने चला आया।"

उन्होंने तुरंत कहा “हमार तबीयत ठीक बा, अब जा! एक तरह से उन्होंने मुझे कमरे से बाहर निकाल दिया। मैं बाहर आ गया, बाकी लोगों का इंतजार करने लगा। जेपी ने मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया यह जानने के लिए मैं बेचैन था! बाद में जब बाकी लोग निकले तो मैंने पूछा कि आखिर बात क्या थी, लेकिन किसी ने कुछ नहीं बताया।

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उसी दौरान ओमप्रकाश दीपक पटना आ गए। उनसे मेरा पुराना परिचय था। मैंने उनसे पूछा कि मुझे क्या करना चाहिए। उन्होंने सलाह दी कि पटना शहर के अलग-अलग मोहल्लों में कमेटियां बनाइए और धरना-प्रदर्शन शुरू कीजिए। पटना शहर का शायद ही कोई मोहल्ला होगा जहां दो-चार लोग मुझे नहीं जानते हों, या मैं दो-चार लोगों को नहीं जानता होऊं। हमने काम शुरू कर दिया। सुबह जाकर कह देते कि शाम को मीटिंग होगी, और शाम को पहुँचते तो तीस-चालीस-पचास लोग जमा हो जाते। वहां कमेटी बनती, भाषण होते, आंदोलन की बातें होतीं।

मेरे साथ जेपी की जमात के कुछ अपेक्षाकृत नौजवान लोग भी जाते थे। जो पहले सोशलिस्ट पार्टी के साथ जुड़े हुए थे। उनके नाम मुझे याद नहीं हैं। मुझे लगता है कि वे लोग जयप्रकाश को मेरी गतिविधियों को रिपोर्ट करते थे। धीरे-धीरे आंदोलन में हमारी सक्रियता बढ़ी। संचालन समिति में लालू यादव, सुशील मोदी, नीतीश कुमार और दूसरे लोग थे, उन्होंने मुझे भी संचालन समिति में सदस्य के रूप में शामिल (को-ऑप्ट) कर लिया।

संचालन समिति की बैठक महिला चरखा समिति में, जो जयप्रकाश का आवास भी था, प्राय: उनकी उपस्थिति में ही हुआ करती थी। मैं सदस्य के रूप में संचालन समिति की अपनी पहली बैठक में शामिल हुआ। सभी सदस्यों के आ जाने के बाद जेपी बैठक वाले हॉल में दाखिल हुए। उसको हॉल कहना उचित नहीं होगा। वह जेपी का बैठका था। जैसे ही जयप्रकाश नारायण बैठक में आए और कुर्सी पर बैठे, उन्होंने मेरी ओर देखकर कहा- सबसे पहले हम शिवानंद से माफी मांगना चाहेंगे। यह कहकर उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए।

शिवानंद तिवारी ने बताया कि उस समय उनकी क्या स्थिति हुई, वह बता नहीं सकते हैं। उनके सामने जेपी जैसा व्यक्ति हाथ जोड़कर माफी मांग रहा था। उनका हाथ भी तुरंत जुड़ गया और मुंह से निकला- अइसन मत करीं। हमरा पाप लागी। रउआ अधिकार बा हमरा के बोले के, डांटे के।

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उन्होंने बताया कि तमाम लोग इस दृश्य को चकित भाव से देख रहे थे। तब जेपी ने कहा- हम क्या करें? इसके पिताजी ही आकर कहते थे कि उनका बेटा बिगड़ गया है। लेकिन लोगों ने हमें बताया कि तुम किस तरह काम कर रहे हो। इस तरह की ऊर्जा वाले लोग जब सही दिशा में लगते हैं तो बहुत काम के साबित होते हैं।

शिवानंद तिवारी के अनुसार जेपी की महानता का उनका यह पहला अनुभव था। इतना बड़ा आदमी, जिनके सामने देश झुकता था, उन्होंने अपने ही एक शिष्य के बेटे से हाथ जोड़कर माफी मांगी। यह जेपी की महानता थी। उनके पास कोई साधारण आदमी भी जाता था तो उससे जिस तरह मिलते कि उसे महसूस होता था कि वह भी महत्वपूर्ण है।

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