ताजपोशी के बाद अब विकसित बिहार की बारी, सम्राट चौधरी के सामने क्या-क्या हैं चुनौतियां
राज्य की सबसे बड़ी चुनौती आमदनी का सीमित स्रोत है। नीतीश कुमार की सरकार ने अपने अथक प्रयास से राज्य का आंतरिक स्रोत 75 हजार 202 करोड़ तक पहुंचाया है। इसे दोगुना करने की दरकार है। इसके लिए संभावनाएं तलाशनी होंगी। कठोर फैसले भी करने पड़ सकते हैं।
सम्राट चौधरी की ताजपोशी के साथ बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने की भाजपा की मुराद पूरी हो गई है। नीतीश कुमार ने अपने दो दशक के शासनकाल में राज्य का कायाकल्प किया। विकास की ठोस बुनियाद खड़ी की। उन्होंने हर मोर्चे पर काम किया। आधारभूत संरचना ही नहीं, आम आदमी के जीवन स्तर में बदलाव, आर्थिक विकास, महिला सशक्तीकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती- किसानी, ऊर्जा के क्षेत्र में उनके कार्य अविस्मरणीय रहेंगे। अब बारी सम्राट चौधरी और भाजपा की है। ठोस बुनियाद से उड़ान भरने की चुनौती नई सरकार के सामने है। नीतीश कुमार ने सत्ता ही नहीं, विकसित बिहार बनाने की जिम्मेवारी भी सौंपी है।
न्याय के साथ विकास की अवधारणा को तत्काल बदलकर सम्राट सरकार ने उसे बदलता बिहार बढ़ता बिहार कर दिया है। बिहार बदल और बढ़ रहा है, यह सौ फीसदी सच है। लेकिन, बदलने-बढ़ने की रफ्तार पर चिंतन- मनन की ज्यादा दरकार है। नीतीश कुमार के कार्यकाल में राज्य की औसत विकास दर दस फीसदी से अधिक रही। बजट आकार साल-दर-साल बढ़ता गया। बिहार ने विकास के कई मानक देश के सामने पेश किए। बावजूद इसके प्रख्यात अर्थशास्त्री स्व. शैबाल गुप्ता अक्सर कहा करते थे कि बिहार को अगर विकसित राज्यों की कतार में खड़ा होना है तो विकास दर 20 फीसदी से अधिक करनी होगी। अन्यथा दस फीसदी की रफ्तार से विकसित राज्य बनने में पांच दशक लग जाएंगे। उनके तर्क के हिसाब से अभी तीन दशक बाकी हैं। सम्राट चौधरी की सरकार के सामने चुनावी वायदा पूरा करने के लिए महज साढ़े चार वर्षों का वक्त है।
नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को इसका अनुमान है। शपथ ग्रहण के घंटे भर बाद ही राज्य के आला अधिकारियों के साथ बैठक में उन्होंने दो टूक कहा कि दोगुनी रफ्तार से काम करना होगा। काम को लटकाने की प्रवृत्ति त्यागनी होगी। यानी विकसित राज्य का संकल्प पूरा करने के लिए विकास की गति दोगुनी करनी होगी। नीतीश कुमार ने विशेष राज्य का दर्जा हासिल करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। भाजपा भी उनके साथ खड़ी रही। विशेष दर्जा नहीं मिला, लेकिन इसका फायदा विशेष पैकेज के बतौर मिला। सम्राट चौधरी की सबसे बड़ी ताकत डबल इंजन है। केन्द्र में भी एनडीए की सरकार है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बिहार को आगे बढ़ाने में खुद दिलचस्पी ले रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस वजह से उनकी बार-बार तारीफ करते रहे। सम्राट चौधरी को नीतीश कुमार का भी पूरा समर्थन है।
राज्य की सबसे बड़ी चुनौती आमदनी का सीमित स्रोत है। नीतीश कुमार की सरकार ने अपने अथक प्रयास से राज्य का आंतरिक स्रोत 75 हजार 202 करोड़ तक पहुंचाया है। इसे दोगुना करने की दरकार है। इसके लिए संभावनाएं तलाशनी होंगी। कठोर फैसले भी करने पड़ सकते हैं। राज्य को केन्द्रीय करों में हिस्सेदारी और अनुदान मद में दो लाख 10 हजार करोड़ मिलता है। 61 हजार 939 करोड़ बाजार से कर्ज का प्रावधान ताजा बजट में है। आंतरिक संसाधन अपनी जरूरतों की कसौटी पर अभी भी बेहद कम है। ऊंची छलांग लगाने के लिए इसका दायरा बढ़ाना अनिवार्य होगा। आगे बड़े पैमाने पर नियुक्तयां होनी है। इसके अलावा कल्याणकारी योजनाओं पर भी बड़ा खर्च होना है।
राज्य की बड़ी चिंता और चुनौती बेरोजगारी, प्रति व्यक्ति आमदनी, पलायन और उद्यमिता का अभाव है। राज्य में हुई जातीय जनगणना में 94 लाख परिवार गरीब पाए गए। राज्य सरकार ने इन परिवारों को दो- दो लाख रुपये बतौर आर्थिक सहायता देने का फैसला किया। मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना इसी की कड़ी है। इसके तहत एक करोड़ 81 लाख महिलाओं के खाते में दस- दस हजार रुपये भेजे गए हैं। इनमें बेहतर कारोबार करने वाली महिलाओं को दो- दो लाख रुपये तक की मदद की योजना है। इन सब पर बड़ा खर्च होना है।
नीतीश कुमार ने राज्य की बागडोर संभालने के बाद कहा था कि हम चुनौतियों को अवसर में बदलेंगे। अब सम्राट चौधरी के लिए भी यह मूलमंत्र हो सकता है। उनके सामने चुनौतियां हैं तो अवसर भी है। राज्य में शासन पटरी पर है। सुशासन का आवरण है। खुद उत्साही और काम करने की क्षमता से लैस हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें दी बधाई में कहा है कि उनकी ऊर्जा, जनसेवा के प्रति समर्पण और जमीनी अनुभव राज्य के लिए उपयोगी साबित होगा। जाहिर है नए मुख्यमंत्री को केन्द्र का भी पूरा सहयोग मिलेगा और कुछ नया कर दिखाने का अवसर होगा।




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