1 दोषी को बचाने में फंसे 6 अफसर, चुनाव में हुई थी बड़ी गड़बड़ी; डीएम को कार्रवाई करने का आदेश
अब ग्रामीण विकास विभाग के अपर सचिव मन्जु प्रसाद ने आयोग के निर्देश के आलोक में देरी के लिए दोषी अधिकारियों को चिन्हित कर कार्रवाई का आदेश डीएम को दिया है।

बिहार में हुए पिछले पंचायत चुनाव में धांधली के दोषी मुजफ्फरपुर के मुरौल प्रखंड के बीडीओ को बचाने में अधिकारियों की लापरवाही पर ग्रामीण विकास विभाग ने गहरी नाराजगी जताई है। मुरौल की तत्कालीन बीडीओ चंद्रकांता को राज्य निर्वाचन आयोग ने मतदान में गड़बड़ी कराने का आरोपी बताया था। उनके खिलाफ नोटिस जारी करते हुए आरोप पत्र दाखिल करने का आदेश दिया था। लेकिन, अधिकारियों ने बीडीओ के खिलाफ आरोप पत्र करीब साढ़े तीन साल रोके रखा और उनकी सेवानिवृत्ति के ठीक दो दिन पहले आरोप पत्र दाखिल किया। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए विभाग ने अब देरी के लिए दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई का आदेश दिया है।
वर्ष 2021 के पंचायत चुनाव में मुरौल में मतदान में गड़बडी की शिकायत चुनाव आयोग से की गई थी। आयोग ने जांच के बाद शिकायत को सही पाते हुए तत्कालीन बीडीओ चंद्रकांता के खिलाफ नोटिस जारी किया था। इसके साथ ही चुनाव आयोग ने बीडीओ पर आरोप पत्र दाखिल करने के भी आदेश दिए थे। इस मामले में तत्कालीन बीडीओ ने अपना स्पष्टीकरण फरवरी 2022 में दाखिल किया। स्पष्टीकरण असंतोषजनक पाए जाने पर आयोग ने उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करने का आदेश अधिकारियों को दिया। इसके बाद स्थानीय अधिकारियों ने आरोपी बीडीओ को बचाने का खेल शुरू कर दिया। बीडीओ के खिलाफ साढ़े तीन साल तक आरोप पत्र को दबाए रखा और यह आरोप पत्र बीडीओ की सेवानिवृत्ति के महज दो दिन पहले प्रस्तुत किया गया।
अब ग्रामीण विकास विभाग के अपर सचिव मन्जु प्रसाद ने आयोग के निर्देश के आलोक में देरी के लिए दोषी अधिकारियों को चिन्हित कर कार्रवाई का आदेश डीएम को दिया है। बताया जाता है कि इस दौरान आधा दर्जन(6) अधिकारियों के पास आरोप पत्र की फाइल गई, लेकिन अधिकारियो ने उसे आगे बढ़ाने की बजाए दबाए रखा। अब इन अधिकारियों पर कार्रवाई की रिपोर्ट ग्रामीण विकास विभाग के माध्यम से राज्य निर्वाचन आयोग को भेजी जाएगी।
मुखिया पद के उम्मीदवार का बदल गया था चुनाव चिह्न
दरअसल, पंचायत चुनाव में मुरौल की ईटहा रसुलनगर पंचायत के मुखिया पद के एक उम्मीदवार का चुनाव चिह्न ही बदल दिया गया था। इस मामले में उम्मीदवार ने निर्वाची अधिकारी से शिकायत की, लेकिन वहां अनदेखी कर दी गई। इसके बाद उम्मीदवार ने राज्य निर्वाचन आयोग में शिकायत की और फिर हाईकोर्ट में मामला दर्ज करा दिया। इस पूरी प्रक्रिया में अंतत: बीडीओ को इसके लिए दोषी पाते हुए कार्रवाई का निर्देश दिया गया, लेकिन अधिकारियों ने उसके खिलाफ आरोप पत्र में ही इतनी देर कर दी कि उसकी सेवानिृत्ति के दो दिन बच गए। अब इस मामले में उन अधिकारियों की गर्दन फंस गई है, जिनके कार्यकाल में आरोप पत्र दाखिल करने में देरी हुई।




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