बिहार के 261 शहरों में कूड़े का पहाड़, कूड़ा संग्रहण योजना फेल; प्रदूषण और बीमारियां फैल रहीं
कोसी, सीमांचल और पूर्वी बिहार के अधिकतर जिलों में ठोस कचरा प्रबंधन व्यवस्था बदहाल है। कई स्थानों पर न तो प्रोसेसिंग यूनिट चालू है और न ही वैज्ञानिक तरीके से डंपिंग की समुचित व्यवस्था। सुपौल में एमआरएफ सेंटर की योजना अटकी है तो भागलपुर में चालू नहीं है।

राज्य के 261 शहरों में जगह-जगह कूड़े का अंबार लगा है। कई जगह तो यह पहाड़ सा दिखने लगा है। शहरों में सड़कों के किनारे, नदियों और रेलवे लाइन के आसपास और खाली जमीन पर कचरे के पहाड़ खड़े हो गए हैं। यह न केवल प्रदूषण का कारण बन रहे हैं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में बीमारियां भी बांट रहे हैं। इससे निजात पाने की योजना कई बार बनी पर आज तक धरातल पर नहीं उतर पाई। यहां तक कि क्लस्टर बनाकर कूड़ा संग्रहण की योजना भी परवान नहीं चढ़ पाई।
कई जगह प्रसंस्करण इकाई लगी है तो चालू नहीं है, ज्यादातर शहरों में लगी ही नहीं है। छोटे शहरों में जमीन की दिक्कत है। वहां प्रसंस्करण इकाई भी नहीं लगी है। अब स्वच्छता सर्वे सिर पर है। इस हाल में कचरा संग्रहण, उठाव और प्रसंस्करण के मोर्चे पर खरा उतरना निकायों के लिए टेढ़ी खीर होगी।
पटना के बैरिया में भी कचरे का अंबार लगा है। 24 साल में यहां प्लांट चालू नहीं हो पाया। गया में रोज 450 मीट्रिक टन कचरा का निस्तारण हो रहा है। वैशाली, गोपालगंज, नालंदा, सारण, कैमूर और सीवान में अब तक कचरा निस्तारण का प्लांट स्थापित नहीं हो सका है, जबकि नवादा, भोजपुर, औरंगाबाद और रोहतास में प्लांट निर्माण प्रक्रिया शुरू हुई है। इन निकायों में कचरा प्रबंधन ठप है। औरंगाबाद, छपरा, नवादा, गोपालगंज का भी यही हाल है।
बिहारशरीफ (स्मार्ट सिटी) में रिसाइकिलिंग प्लांट नहीं होने से सात स्थानों पर कचरे के ढेर लग चुके हैं। भभुआ में सेनेटरी लैंडफिल के लिए भूमि विवाद बाधा बना हुआ है। सीवान में भी डंपिंग के लिए जमीन उपलब्ध नहीं है। बिहारशरीफ के आनंद पथ के डॉ. राजीव रंजन ने बताया कि गंदगी और मच्छरों की वजह से हर साल बरसात में डेंगू के मरीज बढ़ जाते हैं। बदबू और धुएं से लोगों को भारी परेशानी
इस संबंध में नगर विकास विभाग का दावा है कि राज्य के ज्यादातर शहरों में कचरा प्रसंस्करण हो रहा है। राज्य के सभी निकायों को मिलाकर 6519 टन कचरा रोजाना निकलता है। इसमें से 2093 कचरा का प्रसंस्करण हो रहा है। यह कुल कचरे का करीब 32 फीसदी है। बड़े शहरों में प्रसंस्करण इकाई लग चुकी है।
पटना में 938 टन, गया में 503 टन, भागलपुर में 229 में से 92 टन, मुजफ्फरपुर में 207 में से 47 टन, बिहारशरीफ में 178 में से 23 टन कचरे का निस्तारण हो रहा है। अन्य शहरों में भी प्रसंस्करण इकाई लगाने की प्रक्रिया चल रही है। सभी निकायों में कूड़ा उठाव किया जा रहा है। कचरा पृथक्करण के बाद डंपिंग जोन में जमा होने के बाद निस्तारित किया जाता है। छोटे निकायों के लिए क्लस्टर बनाकर प्रसंस्करण की व्यवस्था की जा रही है।
कोसी, सीमांचल के शहरों का भी यही हाल
कोसी, सीमांचल और पूर्वी बिहार के अधिकतर जिलों में ठोस कचरा प्रबंधन व्यवस्था बदहाल है। कई स्थानों पर न तो प्रोसेसिंग यूनिट चालू है और न ही वैज्ञानिक तरीके से डंपिंग की समुचित व्यवस्था। सुपौल में एमआरएफ सेंटर की योजना अटकी है तो भागलपुर में चालू नहीं है। मधेपुरा में कूड़ा निस्तारण इकाई चालू नहीं है। खगड़िया में जमीन की दिक्कत है। पूर्णिया में खाद तैयार हो रही है, अररिया में इकाई निर्माण अधूरी है। जमुई में जमीन चिह्नित करने की प्रक्रिया जारी है।
उत्तर बिहार के शहरों में कचरा प्रबंधन की व्यवस्था नहीं
उत्तर बिहार के प्रमुख शहरों में कचरा प्रबंधन की स्थिति बेहद चिंताजनक है। करोड़ों रुपये खर्च करने और नगर निकायों के अपग्रेडेशन के बावजूद धरातल पर योजनाएं पूरी तरह विफल साबित हो रही हैं। मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, बेतिया, समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी व सीतामढ़ी सभी शहरों में कचरा निस्तारण के बजाए कूड़े के पहाड़ खड़े हो गए हैं। कचरे निस्तारण के लिए प्लांट की बात करें तो सीतामढ़ी, मधुबनी, मोतिहारी और समस्तीपुर कंपोस्ट प्लांट हैं लेकिन इसका उपयोग नहीं हो रहा है।
मुजफ्फरपुर में तीन साल से निस्तारण ठप है। एमआरएफ प्रोसेसिंग प्लांट का टेंडर प्रक्रिया में फंसा हुआ है। मोतिहारी व बेतिया में कचरा डंपिंग के लिए स्थायी जमीन नहीं है। समस्तीपुर, दरभंगा व मधुबनी में सरकारी जमीन नहीं मिलने से शहर का कूड़ा शहर के भीतर ही डंप हो रहा है। इससे प्रदूषण चरम पर है।
यहां प्लांट नहीं
सुपौल, मधेपुरा, अररिया, खगड़िया, जमुई, लखीसराय, मुंगेर, बांका, वैशाली, गोपालगंज, नालंदा, सारण, कैमूर और सीवान, मुजफ्फरपुर, पश्चिम चंपारण, दरभंगा, शिवहर
यहां प्लांट पर है निस्तारण नहीं हो रहा
सहरसा, किशनगंज, भागलपुर, समस्तीपुर, मोतिहारी, मधुबनी
यहां कचरे का निस्तारण हो रहा है
● कटिहार, पूर्णिया, किशनगंज, सीतामढ़ी
यहां निस्तारण के लिए प्लांट बन रहा
● नवादा, भोजपुर, औरंगाबाद और रोहतास,
● विषैला धुआं और दुर्गंध से सांस लेने में परेशानी
● डेंगू, मलेरिया, डायरिया और त्वचा रोग का खतरा
● बरसात में सड़ा कचरा नालियों में बहकर जलजमाव
● मच्छर और मक्खियों की बढ़ती संख्या
● खेतों की उर्वरता में गिरावट
● भूजल प्रदूषण की आशंका बढ़ी




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