भोरे विधानसभा सीट: 2025 चुनाव में NDA की अग्निपरीक्षा, करीबी मुकाबले में जीते थे सुनील कुमार
बिहार की भोरे विधानसभा सीट पर इस बार के चुनाव में एनडीए के लिए अग्निपरीक्षा के समान होगा। पिछली बार 2020 के चुनाव में पूर्व आईपीएस सुनील कुमार जेडीयू के टिकट पर करीबी मुकाबले में इस सीट पर जीत हासिल कर पाए थे।

बिहार के गोपालगंज जिले के भोरे को महाभारत काल के वीर योद्धा भूरिश्रवा की धरती कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि ‘भोरे’ नाम भी ‘भूरिश्रवा’ की वजह से पड़ा। बिहार की राजनीति में भी भोरे की अहमियत रही है। यहां से पिछले विधानसभा चुनाव में सिर्फ 462 मतों के अंतर से जदयू के टिकट पर जीते सुनील कुमार प्रदेश के शिक्षा मंत्री हैं। इस लिहाज से एनडीए के लिए इस बार का चुनाव अग्निपरीक्षा से गुजरने से कम नहीं और विकास की कसौटी पर खुद को साबित करने की चुनौती है।
भोरे, गोपालगंज जिले का एकमात्र सुरक्षित (अनुसूचित जाति आरक्षित) विधानसभा क्षेत्र है। 1957 में अस्तित्व में आई भोरे सीट को 1977 में सुरक्षित घोषित किया गया था। अब तक यहां से कुल 16 विधायक चुने गए। इनमें कांग्रेस के सात, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के एक, जनता पार्टी के एक, जनता दल के दो, राष्ट्रीय जनता दल के दो, भाजपा के दो तथा जदयू के एक विधायक शामिल हैं। यहां का चुनावी गणित सूबे के सियासत की हवा के रुख से कदमताल करता रहा है।
नौकरशाही पृष्ठभूमि से आने वाले वर्तमान विधायक सुनील कुमार भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारी रहे हैं। अगस्त 2020 में सेवानिवृत्ति के सिर्फ 29 दिनों बाद उन्होंने जदयू में शामिल होकर राजनीति में कदम रखा। उसी साल वह अपने गृह क्षेत्र से जदयू प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरे। कड़े मुकाबले में भाकपा माले के जितेन्द्र पासवान को सिर्फ 462 मतों से हरा कर वह विधायक बने। सुनील कुमार पहले उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग और फिर मार्च 2024 में शिक्षा मंत्री बनाए गए।
2020 में विधायक ने भाई के लिए छोड़ दी सीट :
शिक्षा मंत्री सुनील कुमार के भाई अनिल कुमार 1985, 2005 और 2015 में भोरे (सु.) से विधायक रहे। लेकिन, 2020 में जब सुनील कुमार जदयू में शामिल हुए तो अनिल ने चुनावी मैदान में नहीं उतरने का निर्णय लिया। भोरे विधानसभा क्षेत्र के ज्यादातर मतदाता ग्रामीण हैं। यहां अनुसूचित जातियां लगभग 14.27 प्रतिशत जबकि 11 फीसदी मुस्लिम वोटर है। इसके अलावे यहां ब्राह्मण, कोइरी, रविदास, राजपूत आदि जातियों की संख्या है।
चंद्रिका राम और राजमंगल मिश्र से भोरे की पहचान
भोरे का बिहार की राजनीति में शुरू से ही दबदबा रहा है। वर्तमान विधायक सुनील कुमार के पिता चंद्रिका राम इस विधानसभा क्षेत्र के पहले विधायक थे। वे प्रदेश के कृषि मंत्री भी बने। पंडित राजमंगल मिश्र 1967 से 1977 तक लगातार विधायक रहे। बाद में वे मीरगंज से भी एक बार विधायक बने। वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में वे गोपालगंज सीट से सांसद निर्वाचित हुए। देश स्तर पर उनकी पहचान थी।
भोरे विधानसभा सीट एक नजर में-
भोरे विधानसभा का क्षेत्र 623 वर्ग किलोमीटर है। यहां 368994 मतदाता हैं। इनमें 187885 पुरुष और 181096 महिला वोटर हैं। भोरे के उत्तर में कुचायकोट और उत्तर प्रदेश, दक्षिण में यूपी, पूर्व में कुचायकोट और हथुआ और पश्चिम में भी यूपी पड़ता है।
पिछले पांच सालों में हुए ये बदलाव-
⦁ बीपीएस कॉलेज में साइंस की पढ़ाई शुरू, बी ग्रेड का दर्जा मिला
⦁ कटैया बायपास बनकर तैयार, 6 नए पुलों का निर्माण कार्य शुरू
⦁ छितौना घाट पुल का टेंडर हुआ
⦁ बैरिया में सुधा डेयरी प्लांट का निर्माण, 32 एकड़ में औद्योगिक क्षेत्र बनेगा
⦁ भोरे, कटैया, विजयीपुर में सीएचसी भवन बने, 10 नए स्वास्थ्य उपकेंद्रों को मंजूरी, भोरे-मीरगंज सड़क का चौड़ीकरण
इस बार के चुनाव के मुख्य मुद्दे
⦁ भोरे को अनुमंडल बनाने की मांग
⦁ बंद पड़ी नाला योजनाओं को शुरू कराना
⦁ नलजल योजना का सुचारु संचालन
⦁ हर घर से कूड़ा उठाव योजना की शुरुआत
⦁ खाद-बीज की कालाबाजारी रुके और किसानों को सही दाम
भोरे से विधायक सह शिक्षा मंत्री सुनील कुमार का दावा है कि उन्होंने 2020 में कोई वादा नहीं किया था, लेकिन 5 सालों में 1200 करोड़ की परियोजनाएं क्षेत्र में चल रही हैं। उनका कहना है कि अगली बार भी वादा नहीं करूंगा, लेकिन अगर जनता ने सेवा का अवसर दिया, तो अधूरे कार्य पूरे करूंगा और विकास की गति को और तेज करूंगा।
सीपीआई माले से प्रत्याशी जितेंद्र पासवान का आरोप है कि विधायक विकास की बातें करते हैं, लेकिन गरीबों को दो-दो लाख रुपये की सहायता अब तक नहीं मिली। नहरों में पानी नहीं है। ट्यूबवेल खराब हैं। डेयरी प्लांट बंद है। महिला कॉलेज की स्थापना नहीं हुई। भूमि पूजन के बावजूद सड़क निर्माण अधूरा है। सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार है।
भोरे विधानसभा सीट से कब कौन जीता-
1957- चंद्रिका राम कांग्रेस
1962- रामबली पांडेय-प्रजा सोशलिस्ट पार्टी
1967-77-राजमंगल मिश्र कांग्रेस
1977- जमुना राम जनता पार्टी
1980- अलगू राम कांग्रेस
1985- अनिल कुमार कांग्रेस
1990-95 इंद्रदेव मांझी जनता दल
2000- विश्वनाथ बैठा भाजपा
2005- अनिल कुमार राजद
2010- डॉ. इंद्रदेव मांझी भाजपा
2015-अनिल कुमार कांग्रेस
2020 सुनील कुमार जदयू
(रिपोर्ट- अजय कुमार त्रिपाठी)




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