बिहार में 'बचपन' का दुश्मन कौन, हर साल कहां गायब हो जा रहे 4000 बच्चे
नेशनल क्राइम रिपोर्ट ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों (2023) में भी तेलंगाना, महाराष्ट्र और ओडिशा के बाद बिहार में मानव तस्करी के सबसे अधिक मामले दर्ज हुए हैं। नाबालिग लड़कों की तस्करी में राजस्थान और नाबालिग लड़कियों की तस्करी में ओडिशा के बाद बिहार का नंबर रहा।

बिहार में हर साल तीन से चार हजार बच्चे लापता हो रहे हैं। बीते कुछ वर्षों के दौरान सालाना औसतन 12 से 14 हजार गुमशुदगी के मामले दर्ज हुए, जिनमें बमुश्किल दो तिहाई बच्चे ही बरामद हो सके हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ 2025 में राज्यभर में बच्चों की गुमशुदगी के दर्ज हुए 14699 मामलों में उस साल 6927 बच्चों की बरामदगी संभव नहीं हो सकी थी। पुलिस को आशंका है कि गायब हो रहे बच्चे ह्यूमन ट्रैफिकिंग (मानव तस्करी) के शिकार हो रहे हैं। उनको जबरन भिक्षावृति, बाल श्रम, वेश्यावृति आदि अनैतिक कार्यों में धकेला जा रहा है।
2013 के बाद चार गुणा तक बढ़ गए गुमशुदगी के आंकड़े : पुलिस सूत्रों के मुताबिक बिहार पुलिस ने गुमशुदगी के मामलों में 24 घंटे के अंदर बरामदगी नहीं होने पर अपहरण की प्राथमिकी दर्ज कराना अनिवार्य कर दिया है। 2013 में यह प्रावधान लागू होने के बाद गुमशुदगी के आंकड़े चार गुणा तक बढ़ गए हैं। पुलिस मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक 2013 से पहले गुमशुदगी के सालाना औसतन तीन हजार मामले दर्ज होते थे, जो अब बढ़ कर 14 हजार तक हो गए हैं। इसी तरह गुमशुदा हो रहे जाने वाले बच्चों की संख्या भी बढ़ी है।
घटनाओं पर प्रभावी कार्रवाई को लेकर एसओपी जारी
इन घटनाओं पर प्रभावी कार्रवाई को लेकर बिहार पुलिस मुख्यालय ने पुलिस अधीक्षकों को एसओपी (मानक संचालन प्रक्रिया) जारी की है। तीन महीने तक बच्चा बरामद नहीं होने पर संबंधित केस जिले की एंट्री ट्रैफिकिंग यूनिट (एटीयू) को सौंप दिया जाता है। पुलिस मुख्यालय के मुताबिक मानव तस्करी से निपटने के लिए बिहार पुलिस ने राज्य के सभी पुलिस और रेलवे जिलों में 44 मानव तस्करी विरोधी इकाईयां (एएचटीयू) स्थापित की हैं। इसके अतिरिक्त, ये इकाईयां पटना, गया और दरभंगा जैसे प्रमुख हवाई अड्डों पर कार्यरत हैं और जल्द ही पूर्णिया हवाई अड्डे पर भी एक इकाई स्थापित करने की योजना है।
प्रत्येक जिले में एसजेपीयू स्थापित की गई है
प्रत्येक जिले में विशेष किशोर पुलिस इकाईयां (एसजेपीयू) स्थापित की गई हैं और पुलिस थानों में बाल कल्याण पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति की गई है। बिहार के 1,196 पुलिस थानों को राष्ट्रीय स्तर पर संचालित ‘ मिशन वात्सल्य ‘ नामक ऑनलाइन पोर्टल से जोड़ा गया है, जहां लापता बच्चों के लिए एम-फॉर्म (लापता फॉर्म) और बरामद बच्चों के लिए आर-फॉर्म (पुनर्प्राप्ति फॉर्म) का उपयोग करके डेटा अपलोड किया जाता है। पूरी प्रक्रिया भारत सरकार और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा जारी व्यापक एसओपी (मानक संचालन प्रक्रिया) के तहत संचालित की जा रही है।
महाराष्ट्र और ओडिशा के बाद बिहार में ज्यादा मानव तस्करी
नेशनल क्राइम रिपोर्ट ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों (2023) में भी तेलंगाना, महाराष्ट्र और ओडिशा के बाद बिहार में मानव तस्करी के सबसे अधिक मामले दर्ज हुए हैं। नाबालिग लड़कों की तस्करी में राजस्थान और नाबालिग लड़कियों की तस्करी में ओडिशा के बाद बिहार का नंबर रहा।




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