बिहार में आठवीं तक के 65 लाख बच्चे पढ़ने नहीं पहुंच रहे स्कूल, माता-पिता का पलायन भी बड़ी वजह
बिहार में माता-पिता को रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन स्कूलों में बच्चों की अनुपस्थिति का बड़ा कारण है। परिवार के मुखिया के जाने के बाद बच्चों को मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। उन्हें घरेलू कामकाज व भाई-बहनों की देखरेख में उलझा में उलझा दिया जाता है।

बिहार में बच्चों को स्कूलों तक पहुंचाने के तमाम प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। सूबे में पहली से आठवीं कक्षा तक के 65 लाख बच्चे नामांकन के बावजूद स्कूलों में पढ़ने नहीं पहुंच रहे। सरकारी स्कूलों में जुलाई माह में महज 55 से 60 फीसदी बच्चों की उपस्थिति दर्ज की गई। सूबे में पहली से पांचवीं कक्षा तक एक करोड़ से अधिक बच्चे नामांकित हैं। इनमें से 40 लाख बच्चे कक्षाओं में अनुपस्थित रह रहे हैं। छठी से आठवीं के कुल 57 लाख बच्चों में से 25 लाख कक्षाओं से गैरहाजिर मिले हैं। सिर्फ मुजफ्फरपुर में पहली से 8वीं तक के सात लाख बच्चों में से तीन लाख बच्चे स्कूल नहीं आ रहे हैं।
आंकड़ा मध्याह्न भोजन को ले बच्चों की संख्या की समीक्षा से सामने आया है। कक्षा में उपस्थित बच्चों को ही मध्याह्न भोजन दिया जाता है। मध्याह्न भोजन पाने वाले बच्चों की संख्या भी सवालों के घेरे में रही है। इसमें उपस्थिति से अधिक बच्चों का आंकड़ा दर्ज किए जाने के मामले सामने आते रहे हैं। स्कूल नहीं पहुंचने वाले बच्चों की संख्या जुलाई के आंकड़ों से भी कहीं अधिक हो सकती है।
जिलों में एक से चार लाख तक बच्चे नहीं आए स्कूल
सूबे के सभी जिलों में पहली से आठवीं तक के एक से चार लाख तक बच्चे जुलाई में स्कूल नहीं पहुंचे। मध्याह्न भोजन योजना निदेशक ने खाद्यान्न की पूर्ति के लिए नामांकित बच्चों की संख्या व जुलाई में लाभान्वित बच्चों की संख्या की रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार, जिलों में पहली से पांचवीं तक के एक से ढाई लाख बच्चे स्कूल नहीं पहुंचे। पूर्वी चंपारण में पहली से पांचवीं में छह लाख बच्चे नामांकित हैं। इनमें से 3 लाख 67 हजार 582 बच्चे स्कूल नहीं आए।
पश्चिम चंपारण में 3 लाख 78 हजार बच्चों में 2 लाख 49 हजार ही स्कूल आए। पटना में 3 लाख 79 हजार बच्चों में से 2 लाख 16 हजार बच्चे ही पढ़ने पहुंचे। मधुबनी में 5 लाख 48 हजार में 2 लाख 99 हजार, मुजफ्फरपुर में 4 लाख 40 हजार में 2 लाख 42 हजार बच्चे ही स्कूल आए। सीतामढ़ी में चार लाख 35 हजार बच्चों में से 2 लाख 13 हजार, वैशाली में 2 लाख 78 हजार में 1 लाख 47 हजार बच्चों ने ही जुलाई में स्कूल में पढ़ाई की।
शिक्षा को मनोरंजक नहीं बना सके
सीबीएसई में काउंसलर डा.प्रमोद कुमार कहते हैं कि शिक्षा को मनोरंजक बनाने के लिए कई नीति बनाई गई, पर स्कूलों में लागू नहीं किया गया है। सरकारी ही नहीं, सीबीएसई स्कूलों में भी कम उपस्थिति के पीछ यह बड़ा कारक है।
माता-पिता का पलायन, काम-धंधा बड़ा कारण
एनसीईआरटी दिल्ली में पदस्थापित नेशनल कैरिकुलम फ्रेमवर्क पर काम करने वाली डॉक्टर शरद सिन्हा ने शिक्षा में बच्चों के पलायन पर शोध किया है। वह कहती हैं कि बिहार में माता-पिता को रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन स्कूलों में बच्चों की अनुपस्थिति का बड़ा कारण है। परिवार के मुखिया के जाने के बाद बच्चों को मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। उन्हें घरेलू कामकाज व भाई-बहनों की देखरेख में उलझा में उलझा दिया जाता है।
बच्चों को स्कूल तक लाने की कई योजनाएं
● एक से आठवीं तक के बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन
● सभी बच्चों को पोशाक के लिए राशि का प्रावधान
● हर कक्षा के बच्चों को छात्रवृत्ति दी जा रही है।
● नि:शुल्क किताब के साथ ही कॉपी, बैग आदि का किट।




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