बिहार के 20 प्रतिशत प्रवासी वोटर भी निशाने पर; चुनाव आयोग से मिलकर राजद, कांग्रेस और लेफ्ट का दावा
बिहार में चुनाव से पहले हो रहे वोटर लिस्ट के रिवीजन के खिलाफ विपक्ष ने दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त से मुलाकात की। आरजेडी, कांग्रेस और लेफ्ट ने दावा किया कि मतदाता गहन पुनरीक्षण के जरिए बिहार के 20 प्रतिशत प्रवासी भी निशाने पर हैं। आयोग उनका नाम वोटर लिस्ट से हटाने की तैयारी में है।

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कराए जा रहे वोटर लिस्ट के रिव्यू यानी मतदाताओं के विशेष गहन पुनरीक्षण पर विपक्षी दलों ने निर्वाचन आयोग के दफ्तर पहुंच कर आपत्ति जताई। आरजेडी, कांग्रेस, वाम दलों समेत इंडिया गठबंधन के 11 दलों के प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त से मुलाकात की। इसके बाद विपक्ष ने दावा किया कि बिहार के 20 प्रतिशत मतदाताओं का नाम वोटर लिस्ट से हटाने की तैयारी है। इनमें अधिकतर प्रवासी वोटर शामिल हैं, जो मजबूरी में पलायन कर गए लेकिन चुनाव के समय घर आकर वोट देते हैं। कांग्रेस, आरजेडी और लेफ्ट पार्टियों ने यह भी कहा कि आयोग ने उनके सवालों का संतोषप्रद जवाब नहीं दिया। जल्द ही इस मुद्दे पर बड़ा आंदोलन किया जाएगा।
प्रतिनिधि दल में शामिल आरजेडी के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने कहा कि चुनाव आयोग की मतदाता पुनरीक्षण कराने की नीति सौहार्दपूर्ण नहीं है। हमने आयोग से मिलकर गरीब, वंचित, दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक सभी की चिंता रखी। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का पत्र चुनाव आयोग सौंपा है। इसमें बिंदुवार पूछा गया है कि गरीबों को वोटर लिस्ट से निकालने की किस तरह साजिश है।
झा ने कहा, "बातचीत के दौरान चुनाव आयोग की तरफ से पता चला है कि बिहार के 20 प्रतिशत लोग जो रोजगार के लिए पलायन कर गए, वे भी निशाने पर हैं। बिहार से बाहर रहने वाले राज्य के लोगों को वोटर लिस्ट से बेदखल करने की साजिश है। हमने मौसम समेत अन्य कई पहलुओं पर चिंता आयोग के सामने रखी, लेकिन कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला।
हर वोट की अहमियत- मनोज झा
आरजेडी सांसद ने कहा कि लोकतंत्र में हर एक वोट की अहमियत होती है। चाहे वो उद्योगपति हो या भूमिहीन किसान, अगर उसके साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं तो उसको खारिज किया जाएगा। आयोग ने यह भी नहीं बताया कि अगर वोटर्स को एक महीने के सर्वे में दिक्कत आएगी तो क्या होगा। किसी का दस्तावेज खो गया है, या अभी उसके पास नहीं है तो उनका क्या होगा।
सीपीआई माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि आयोग से मिलने के बाद हमारी आशंका और बढ़ गई है। हमारे किसी भी सवाल का संतोषप्रद जवाब नहीं मिला। आयोग के अनुसार चुनाव में वोट डालने के लिए बिहार का ऑर्डिनरी रेसिडेंट (मूल प्रवासी) होना जरूरी है।
इसका मतलब है कि जो लोग काम करने बिहार से बाहर जाने को मजबूर हैं, और वोट डालने आते हैं, वे आयोग की नजर में रेसिडेंट नहीं है। उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया जाएगा। इनकी संख्या लगभग 20 प्रतिशत है।
माले नेता ने आयोग के वोटर रिव्यू में मांगे गए दस्तावेजों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कितने ही गरीब ऐसे हैं जिनके पास मैट्रिक, आवास या जाति प्रमाण पत्र नहीं होगा। उनके पास आधार और राशन कार्ड, जॉब कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस जैसे दस्तावेज हो सकते हैं, लेकिन वे मान्य नहीं है।
2003 के बाद वाले वोटर संदिग्ध- माले
उन्होंने कहा कि 2003 में आखिरी बार वोटर लिस्ट का रिव्यू हुआ था, इसके बाद वालों की नागरिकता संदिग्ध है। 2003 के बाद जितने नाम चढ़ेंगे उनको नागरिकता साबित करनी पड़ेगी। वे वोटर लिस्ट से बाहर हो जाएंगे। लोकतंत्र में सबसे बुनियादी अधिकार वोट डालने का अधिकार खतरे में है। उन्होंने कहा कि इस पर बड़े आंदोलन की जरूरत है। आंदोलन के बगैर यह बात नहीं बनेगी।
बिहार कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम ने कहा कि मतदाताओं के गहन पुनरीक्षण के लिए आयोग ने सिर्फ 25 दिन का वक्त दिया है। दिहाड़ी मजदूर जब काम पर जाएंगे, वो घर पर नहीं मिलेंगे तो क्या होगा। मॉनसून का समय है, 70 फीसदी आबादी बाढ़ से प्रभावित रहती है। कटाव से उनका घर का अस्तित्व भी खत्म हो जाता है। ऐसे हालात में उनसे जमीन और घर के कागज मांगेंगे तो वे कैसे ला पाएंगे। चुनाव आयोग से इन सवालों के जवाब नहीं मिले।
उन्होंने कहा कि बिहार में 8 करोड़ मतदाता हैं। आयोग की बातों से जो समझ आया है, उसके अनुसार 20 प्रतिशत मतदाताओं को हटाने की ये पहले ही तैयारी कर चुके हैं। इसे इंडिया गठबंधन एक चुनौती समझता है। वोटर के मताधिकार के लिए हम रक्षा करने को तैयार हैं।




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