Apara Ekadashi vrat katha in hindi: अपरा एकादशी व्रत की कथा पढ़ें, पद्मपुराण में हैं, इसका उल्लेख
Apara ekadashi vrat katha in hindi:ज्येष्ठ के कृष्णपक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहते हैं। इस साल यह एकादशी 13 मई को मनाई जा रही है। 13 मई को एकादशी और द्वादशी दोनों तिथियों का संयोग हैं।

ज्येष्ठ के कृष्णपक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहते हैं। इस साल यह एकादशी 13 मई को मनाई जा रही है। 13 मई को एकादशी और द्वादशी दोनों तिथियों का संयोग हैं। इस दिन पूजा और व्रत कर भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है। पद्मुपुराण में इसकी महात्मय मिलता है, इसकी कथा में सिर्फ महीध्वज से जुड़ी है, जिन्हें इस एकादशी का व्रत करने से प्रेतयोनी से मुक्ति मिली थी।
अपरा एकादशी की कथा इस प्रकार है
युथिष्ठिरने पूछा कि जनार्दन ! ज्येष्ठ के कृष्णपक्ष किस नाम की एकादशी होती है ? मैं उसका माहात्म्य सुनना चाहता हूं। उसे बताने की कृपा करें। भगवान श्रीकृष्ण बोले-राजन्, तुमने सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये बहुत उत्तम बात पूछी है । राजेन्द्र ! इस एकादशी का नाम अपरा है। यह बहुत पुण्य देने वाली और बड़े-बड़े पापों का नाश करनेवाली हे । ब्रह्महत्या से दबा हुआ, गोत्र की हत्या करनेवाला, गर्भस्थ बालक को मारनेवाला, परनिन्दक पुरुष भी अपरा एकादशी के व्रत से निश्चय ही पापरहित हो जाता है। जो झूठी गवाही देता, माप-तोलमें धोखा देता, बिना जाने ही नक्षत्रों की गणना करता और कूटनीति से आयुर्वेद का ज्ञाता बनकर वैद्यका काम करता है--ये सब नरकमें निवास करनेवाले प्राणी हैं। परन्तु अपरा एकादशीके सेवनसे ये भी पापरहित हो जाते हैं। यदि क्षत्रिय क्षात्रधर्मका परित्याग करके युद्धसे भागता है, तोवह क्षत्रियोचित धर्मसे भ्रष्ट होनेके कारण घोर नरक में पड़ता है।
जो दिष्य विद्या प्राप्त करके स्वयं ही गुरु की निंदा करता है, वह भी महापातकों से युक्त होकर भयंकर नरक में गिरता है। किन्तु अपरा एकादशीके सेवनसे ऐसे मनुष्य भी सद्गति को प्राप्त होते हैं। माघ में जब सूर्य मकर राशि पर स्थित हों, उस समय प्रयागमें स्नान करने वाले मनुष्योंको जो पुण्य होता है, काशीमें शिवरात्रि का व्रत करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, गया में पिण्डदान करके पितरों को तृप्ति प्रदान करनेवाला पुरुष जिस पुण्यका भागी होता है, बृहस्पति के सिंह राशि पर स्थित होने पर गोदावरी में स्नान करने वाला मानव जिस फलको प्राप्त करता है, बदरिकाश्रम की यात्राक समय भगवान् केदारके दर्शन से तथा बदरीतीर्थ के सेवनसे जो पुण्य-फल उपलब्धः होता है और सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में दक्षिणासहित यज्ञ करके हाथी, घोड़ा और सुवर्ण-दान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है; अपरा एकादशीके सेवनसे भी मनुष्य वैसे ही फल प्राप्त करता है।
'अपरा' को उपवास करके भगवान् वामन की पूजा करनेसे मनुष्य सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसको पढ़ने ओर सुननेसे सहसत्र गोदानका फल मिलता है। वेदव्यासजी कहते हैं कि दोनों ही पक्षोंकी एकादशियों को भोजन न करे। द्वादशीको स्नान आदिसे पवित्र हो फूलोंसे भगवान् केशवकी पूजा करके नित्यकर्म समाप्त होनेके पश्चात् पहले ब्राह्मणोंको भोजन देकर अन्तमें स्वयं भोजन करे | -पद्मपुराण से ली गई
राजा महीध्वज को मिली प्रेत योनि से मुक्ति
ज्योतिषाचार्य विमल जैन ने बताया कि प्राचीनकाल में राजा महीध्वज थे। वह धर्मात्मा थे। उनका छोटा भाई वज्रध्वज क्रूर और अधर्मी था। वह उनसे द्वेषभाव रखता था। उसने उनकी हत्याकर शरीर पीपल के पेड़ के नीचे दबा दिया। अकाल मृत्यु से राजा महीध्वज प्रेतात्मा हो गए। पीपल के पेड़ पर उनका वास था।प्रेतात्मा के रूप में उन्होंने लोगों को सताना शुरू कर दिया। एक दिन धौम्य ऋषि ने उन्हें देखा। तपोबल से उन्होंने उनका अतीत जान लिया। उन्होंने उनकी प्रेतात्मा पेड़ से नीचे उतारी। परलोक विद्या का उपदेश दिया। उन्हें प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने अचला एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से राजा महीध्वज को प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई।
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