kumbh meen mesh shanivar ke upay shani sade sati remedies for aries aquarius and pisces कुंभ, मीन, मेष वाले शनिवार को करें ये खास उपाय, शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव होगा कम, एस्ट्रोलॉजी न्यूज़ - Hindustan
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कुंभ, मीन, मेष वाले शनिवार को करें ये खास उपाय, शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव होगा कम

शनि की साढ़ेसाती एक ऐसा समय है जब व्यक्ति के जीवन में कई तरह के बदलाव होते हैं। यह साढ़ेसाती साढ़े सात साल की होती है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान कई तरह की समस्याओं से व्यक्ति को कई तरह की समस्याओं से गुजरना पड़ता है।

Fri, 24 April 2026 02:49 PMYogesh Joshi लाइव हिन्दुस्तान
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कुंभ, मीन, मेष वाले शनिवार को करें ये खास उपाय, शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव होगा कम

Shani Sade Sati: ज्योतिषशास्त्र में शनिदेव को विशेष स्थान प्राप्त है। शनिदेव को न्याय का देवता भी कहा जाता है। शनि व्यक्ति को कर्मों के हिसाब से फल देते हैं। ऐसा नहीं है कि शनि सिर्फ अशुभ फल देते हैं। शनि शुभ फल भी देते हैं। शनि के अशुभ होने पर जहां व्यक्ति को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. वहीं शुभ होने पर व्यक्ति का भाग्योदय हो जाता है। शनि की साढ़ेसाती एक ऐसा समय है जब व्यक्ति के जीवन में कई तरह के बदलाव होते हैं। यह साढ़ेसाती साढ़े सात साल की होती है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान कई तरह की समस्याओं से व्यक्ति को कई तरह की समस्याओं से गुजरना पड़ता है। शनि की साढ़ेसाती के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए शनिवार को कुछ विशेष उपाय भी किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनिवार का दिन शनिदेव को समर्पित होता है, इसलिए इस दिन किए गए उपाय विशेष फल देते हैं।

आइए जानते हैं, मेष, कुंभ, मीन वाले शनिवार को क्या खास उपाय करें-

शनिवार के दिन शनि की साढ़ेसाती के जातकों को राजा दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। इसका पाठ करने से शनि की साढ़ेसाती के अशुभ प्रभावों से बचा जा सकता है।

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आगे पढ़ें, राजा दशरथ कृत शनि स्तोत्र

दशरथ उवाच:

प्रसन्नो यदि मे सौरे ! एकश्चास्तु वरः परः ॥

रोहिणीं भेदयित्वा तु न गन्तव्यं कदाचन् ।

सरितः सागरा यावद्यावच्चन्द्रार्कमेदिनी ॥

याचितं तु महासौरे ! नऽन्यमिच्छाम्यहं ।

एवमस्तुशनिप्रोक्तं वरलब्ध्वा तु शाश्वतम् ॥

प्राप्यैवं तु वरं राजा कृतकृत्योऽभवत्तदा ।

पुनरेवाऽब्रवीत्तुष्टो वरं वरम् सुव्रत ॥

दशरथकृत शनि स्तोत्र:

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च ।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।

नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते ॥2॥

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम: ।

नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते ॥3॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम: ।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ॥4॥

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते ।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ॥5॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते ।

नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ॥6॥

तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च ।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे ।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥

देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा: ।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत: ॥9॥

प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे ।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥

दशरथ उवाच:

प्रसन्नो यदि मे सौरे ! वरं देहि ममेप्सितम् ।

अद्य प्रभृति-पिंगाक्ष ! पीडा देया न कस्यचित्

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डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य है और सटीक है। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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