भगवान के अनेक विग्रहों की पूजा करने से अधिक फल मिलता है? जानें प्रेमानंद महाराज का जवाब
एक भक्त ने प्रेमानंद महाराज से सवाल पूछा कि क्या घर में भगवान के अनेक विग्रहों की पूजा करने से अधिक फल मिलता है? चलिए जानते हैं कि महाराज जी ने क्या जवाब दिया? प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि भगवान तो एक ही हैं। उनके 100 या 200 नहीं बल्कि अनंत रुप हैं।

उत्तर प्रदेश में मथुरा के फेमस संत प्रेमानंद महाराज के आश्रम से उनके कई वीडियोज सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके हैं। यहां तक उनके दर्शन के अलावा लोग उनसे तरह-तरह के सवाल भी पूछते हैं। ऐसे ही एक भक्त ने प्रेमानंद महाराज से सवाल पूछा कि क्या घर में भगवान के अनेक विग्रहों की पूजा करने से अधिक फल मिलता है? चलिए जानते हैं कि महाराज जी ने क्या जवाब दिया?
महाराज जी का जवाब
इस सवाल का जवाब देते हुए प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि भगवान तो एक ही हैं। उनके 100 या 200 नहीं बल्कि अनंत रुप हैं। आप जितने चाहों विराजमान करके पूजा कर लो, लेकिन फल तो एक ही मिलेगा। वो आगे कहते हैं कि आप हजार जगह भाव बांटे हुए, तो आपका भाव उस कोटि का नहीं जितना एक पूजा में भाव लगाए हुए है, तो आपका कम रहेगा।
महाराज जी कहते हैं कि हजार जगह पूजा करने पर भी आपका फल कम रहेगा और एक जगह पूजा करता है, तो बाजी मार लेता है। क्योंकि भगवान तो एक ही हैं ना। तो आप किसी एक रूप की पूजा करें। जैसे- रामकृष्ण परमहंस जी ने मां काली को पूजा। उन्होंने मां काली में ही भगवान श्री कृष्ण को देखा, मां में राम को देखा, मां में ही सबको देखा। जैसे तुलसी दास जी ने राम जी को, गोपियों ने श्रीकृष्ण को देखा। प्रेम एक जगह होता है, बहुत जगह नहीं होता है। बहुत जगह पर व्यवहार होता है।
एक भगवान की पूजा
महाराज जी कहते हैं कि भगवान से यदि प्रेम करना है तो भगवान के किसी एक रूप को आप स्वीकार कर लो और उन्हीं का नाम जप करो, उन्हीं का ध्यान करो। उन्हीं की पूजा करो। इसीलिए गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। अर्थात् अनन्य चिंतन की मांग भगवान ने की है।अनन्य माने एक में लग जाना है। एक भरोसो, एक बल और एक आस विश्वास एक राम घनश्याम हे चातक तुलसी दास। जैसे चातक गंगा जी में भी गिरे तो चोंच नहीं मारेगा। प्यासा मर जाएगा। वो पिएगा, तो सिर्फ स्वाति की बूंद को ही पीएगा।
महाराज जी कहते हैं कि ऐसे ही एक भगवान में रति हो जाए राम जी में, श्याम जी में, माता या पिता जी में, जहां भी एक मान लो उनको एक मानकर के पूजा करो, पर प्रारंभ अनेक से होती है। लेकिन धीरे-धीरे एक में रति हो जाती है।




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