chandra grahan 2026 why are temples closed during solar and lunar eclipse in hinduism चंद्र ग्रहण 2026: आखिर ग्रहण के दौरान मंदिरों के कपाट क्यों बंद कर दिए जाते हैं? जानिए कारण, एस्ट्रोलॉजी न्यूज़ - Hindustan
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चंद्र ग्रहण 2026: आखिर ग्रहण के दौरान मंदिरों के कपाट क्यों बंद कर दिए जाते हैं? जानिए कारण

Chandra Grahan 2026: सूर्य या चंद्र ग्रहण के दौरान मंदिरों के कपाट बंद करने की परंपरा सदियों पुरानी है। आइए विस्तार से समझते हैं इसके पीछे के प्रमुख कारण और शास्त्रीय आधार।

Tue, 3 March 2026 09:10 AMNavaneet Rathaur लाइव हिन्दुस्तान
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चंद्र ग्रहण 2026: आखिर ग्रहण के दौरान मंदिरों के कपाट क्यों बंद कर दिए जाते हैं? जानिए कारण

Lunar Eclipse 3 March 2026: हिंदू धर्म में सूर्य या चंद्र ग्रहण के दौरान मंदिरों के कपाट बंद करने की परंपरा सदियों पुरानी है। 3 मार्च 2026 को लगने वाले पूर्ण चंद्र ग्रहण के अवसर पर यह सवाल फिर से चर्चा में है कि आखिर ग्रहण के समय मंदिरों के द्वार क्यों बंद किए जाते हैं? यह परंपरा केवल रूढ़िवाद नहीं, बल्कि वैदिक साहित्य, पुराणों और धर्मशास्त्रों में वर्णित शुद्धि, सूतक और आध्यात्मिक सावधानी से जुड़ी हुई है। आइए विस्तार से समझते हैं इसके पीछे के प्रमुख कारण और शास्त्रीय आधार।

सूतक काल और अशुद्धि की मान्यता

ग्रहण काल को शास्त्रों में 'सूतक' का समय कहा गया है। सूतक वह अवधि है जब पूजा-अर्चना, भोग लगाना, मूर्ति स्पर्श और अन्य बाह्य धार्मिक कर्म वर्जित हो जाते हैं। चंद्र ग्रहण में सूतक नौ घंटे पहले और सूर्य ग्रहण में बारह घंटे पहले शुरू हो जाता है। इस दौरान मंदिरों में नियमित पूजा स्थगित कर दी जाती है और कपाट बंद कर दिए जाते हैं। धर्मशास्त्रों (जैसे धर्मसिन्धु) में स्पष्ट निर्देश है कि सूतक काल में देवमूर्तियों को स्पर्श नहीं करना चाहिए। इसलिए मंदिर प्रशासन कपाट बंद करके मूर्तियों को सुरक्षित रखता है।

नकारात्मक ऊर्जा और राहु-केतु का प्रभाव

ग्रहण के समय राहु और केतु का प्रभाव बढ़ जाता है। पौराणिक कथाओं में राहु-केतु द्वारा सूर्य या चंद्र को ग्रसने की घटना को ब्रह्मांडीय संकट माना गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दौरान वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा (तमोगुण) का संचार बढ़ता है। मंदिरों में प्राण-प्रतिष्ठित मूर्तियां केवल पत्थर नहीं होतीं, उनमें दिव्य ऊर्जा निवास करती है। ग्रहण के विकिरण या अशुभ प्रभाव से मूर्ति की ऊर्जा प्रभावित न हो, इसलिए कपाट बंद करके एक प्रकार का आध्यात्मिक सुरक्षा कवच बनाया जाता है।

प्राण-प्रतिष्ठित मूर्तियों की रक्षा

प्राण-प्रतिष्ठा के बाद मूर्ति में देवत्व का वास हो जाता है। ग्रहण को सूतक काल मानकर मूर्ति स्पर्श और भोग वर्जित कर दिए जाते हैं। स्कंद पुराण और पद्म पुराण में ग्रहण के समय पूजा स्थगित रखने और देवमूर्तियों को स्पर्श नहीं करने का उल्लेख मिलता है। मंदिरों के कपाट बंद करने का उद्देश्य मूर्ति की ऊर्जा को सुरक्षित रखना और भक्तों को भी किसी अनावश्यक प्रभाव से बचाना है। ग्रहण समाप्त होने के बाद शुद्धिकरण (गंगाजल अभिषेक) के पश्चात ही पट खोले जाते हैं।

भगवान का विश्राम और एकांत का समय

कुछ पुराणों में ग्रहण को भगवान का ‘कष्ट’ काल बताया गया है। राहु-केतु द्वारा ग्रहण करने की घटना को संकट का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान भगवान को भी विश्राम और एकांत दिया जाता है।

मत्स्य पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में ग्रहण के समय विशेष धार्मिक आचरण और नियमों का उल्लेख है। भक्तों की मान्यता है कि इस समय भगवान भी विश्राम करते हैं, इसलिए दर्शन स्थगित कर दिए जाते हैं। ग्रहण समाप्ति के बाद विशेष शुद्धि और पूजन के पश्चात दर्शन शुरू होते हैं।

ग्रहण समाप्ति के बाद शुद्धि और पट खुलने की प्रक्रिया

ग्रहण समाप्त होते ही मंदिरों में शुद्धिकरण की प्रक्रिया शुरू होती है। गंगाजल से परिसर और मूर्तियों का अभिषेक किया जाता है। देवमूर्ति को नवीन वस्त्र धारण कराए जाते हैं। विशेष आरती, हवन और दान-पुण्य के बाद पट खोले जाते हैं।

धर्मशास्त्रों के अनुसार, ग्रहण काल साधना, जप और आत्मचिंतन का समय है। बाह्य पूजा को विराम देकर आंतरिक एकाग्रता पर बल दिया जाता है। यही कारण है कि ग्रहण के दौरान मंदिरों के कपाट बंद किए जाते हैं और शुद्धि के पश्चात ही नियमित पूजा-अर्चना शुरू होती है।

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यह परंपरा केवल रूढ़िवाद नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सुरक्षा और शुद्धता का प्रतीक है। 3 मार्च 2026 के चंद्र ग्रहण पर भी यही नियम लागू होंगे। भक्तों से अपील है कि वे घर पर ही नाम जप और प्रार्थना करें। ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान कर दर्शन करें।

डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों के पूर्णतया सत्य एवं सटीक होने का हम दावा नहीं करते हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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