Chandra Grahan 2026: सूतक काल में नहीं बंद होता है देवघर का बैद्यनाथ धाम, जानिए कारण
अन्य मंदिरों में चंद्र ग्रहण के सूतक काल में कपाट बंद हो जाते हैं, लेकिन बैद्यनाथ धाम में सूतक का प्रभाव नहीं पड़ता है। मंदिर के पट ग्रहण काल में ही बंद होते हैं। आइए जानते हैं कारण।

3 मार्च 2026 को फाल्गुन पूर्णिमा पर पड़ने वाला पूर्ण चंद्र ग्रहण देवघर के बाबा बैद्यनाथ धाम के लिए विशेष महत्व रखता है। अन्य मंदिरों में ग्रहण के सूतक काल में कपाट बंद हो जाते हैं, लेकिन बैद्यनाथ धाम में सूतक का प्रभाव नहीं पड़ता है। मंदिर के पट ग्रहण काल में ही बंद होते हैं। इस दिन शाम 4 बजे पट बंद होंगे और ग्रहण समाप्त होने के बाद शाम साढ़े सात बजे के आसपास शृंगार पूजा के लिए फिर खुलेंगे। आइए जानते हैं इस अनोखी परंपरा के पीछे के कारण और धार्मिक आधार।
बैद्यनाथ धाम में सूतक काल क्यों नहीं लगता?
बाबा बैद्यनाथ धाम में चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण के सूतक काल का प्रभाव नहीं माना जाता है। इसका मुख्य कारण है कि यहां के ज्योतिर्लिंग बाबा बैद्यनाथ के मस्तक पर चंद्रमा स्वयं विराजमान हैं। पुराणों और शास्त्रों के अनुसार, जहां भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा स्थित है, वहां चंद्र ग्रहण का सूतक नहीं लगता है। इसी वजह से देवघर में ग्रहण से 9 घंटे पहले सूतक शुरू होने की परंपरा लागू नहीं होती है। मंदिर के पट सूतक में नहीं बंद होते, बल्कि ग्रहण काल प्रारंभ होने पर ही बंद किए जाते हैं। यह धाम 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और चंद्रमा की उपस्थिति इसे ग्रहण से मुक्त रखती है।
ग्रहण के दौरान पट बंद होने का समय
देवघर के बैद्यनाथ धाम में सूतक लागू नहीं होता, लेकिन ग्रहण काल में मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं। 3 मार्च 2026 को ग्रहण शाम 5:47 बजे से 6:48 बजे तक रहेगा। मंदिर प्रशासन ने सूचना जारी कर बताया है कि पट शाम 4 बजे बंद कर दिए जाएंगे। इस दौरान आम श्रद्धालुओं का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। ग्रहण समाप्त होने के बाद मंदिर का शुद्धिकरण (गंगाजल अभिषेक, मूर्ति स्नान और विशेष पूजा) किया जाएगा। शुद्धिकरण पूरा होने के बाद शाम साढ़े सात बजे के आसपास श्रृंगार पूजा के लिए पट फिर से खोले जाएंगे।
ग्रहण काल में पूजा-अर्चना क्यों स्थगित रहती है?
ग्रहण के समय राहु-केतु का प्रभाव बढ़ जाता है। शास्त्रों में इस दौरान पूजा-अर्चना, भोग लगाना और मूर्ति स्पर्श वर्जित माना गया है। बैद्यनाथ धाम में भी ग्रहण काल में नियमित पूजा स्थगित कर दी जाती है। यह परंपरा मंदिर की दिव्य ऊर्जा को सुरक्षित रखने और भक्तों को किसी अनावश्यक प्रभाव से बचाने के लिए है। ग्रहण समाप्त होने के बाद विशेष शुद्धि और पूजन के पश्चात ही सेवा-पूजा पुनः शुरू होती है। इस दौरान भक्तों से घर पर ही नाम जप, ध्यान और बाबा का स्मरण करने की अपील की जाती है।
देवघर में इस दुर्लभ संयोग का उत्साह
इस साल होलिका दहन, चंद्र ग्रहण और फाल्गुन पूर्णिमा का संयोग बहुत दुर्लभ है। देवघर में बाबा नगरी में उत्साह का माहौल है। श्रद्धालु इस ऐतिहासिक होली के साक्षी बनने को उत्सुक हैं। जहां एक ओर होलिका दहन की रात नकारात्मकता जल रही होगी, वहीं दूसरी ओर बैद्यनाथ धाम में बाबा की कृपा से भक्तों को आशीर्वाद मिलेगा। मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं से समय-सारिणी का पालन करने और शांति बनाए रखने की अपील की है।
ग्रहण समाप्ति के बाद क्या करें?
ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें। मंदिर में प्रवेश करने से पहले गंगाजल से हाथ-मुंह धोएं। शाम साढ़े सात बजे के बाद शृंगार पूजा में शामिल होकर बाबा बैद्यनाथ के दर्शन करें। घर पर होलिका की राख से तिलक लगाने से भी नजर दोष और नकारात्मकता दूर होती है। इस दिन दान-पुण्य, जप और प्रार्थना से विशेष पुण्य मिलता है। ग्रहण के बाद अगले दिन होली (धुलेंडी) मनाने के लिए तैयार रहें।
देवघर का बैद्यनाथ धाम ग्रहण के सूतक से मुक्त होने के कारण विशेष है। भक्तों को समय का ध्यान रखकर दर्शन की योजना बनानी चाहिए। घर पर ही बाबा का नाम जप से इस दिन का लाभ उठाएं।




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