Aaj ki Katha: श्रीकृष्ण पर लगा था मणि चोरी का कलंक, पढ़ें कैसे भगवान कृष्ण ने इसे मिटाया
। एक बार सत्राजित स्यमंतक मणि को गले में पहनकर, कृष्ण की राजसभा में गया। स्यमंतक मणि के कारण सत्राजित दूसरे सूर्य की भांति ज्ञात हो रहा था। सभी आश्चर्य से उसे आंखें फाड़ कर देख रहे थे।

सत्राजित ने सूर्यदेव की उपासना करके उन्हें प्रसन्न किया। फलस्वरूप सूर्य ने उन्हें स्यमंतक मणि प्रदान की। वह सूर्य के समान तेजोमयी थी। इस मणि को धारण करने वाले व्यक्ति का प्रभाव सूर्य के समान हो जाता था। एक बार सत्राजित स्यमंतक मणि को गले में पहनकर, कृष्ण की राजसभा में गया। स्यमंतक मणि के कारण सत्राजित दूसरे सूर्य की भांति ज्ञात हो रहा था। सभी आश्चर्य से उसे आंखें फाड़ कर देख रहे थे। राजसभा के सभी सदस्य उठकर खड़े हो गए और एक स्वर में कह उठे, ‘यह दूसरा सूर्य कहां से आ गया?’कृष्ण ने राजसभा के सदस्यों को बताया, यह दूसरा सूर्य नहीं, सत्राजित है। स्यमंतक मणि पहनने के कारण यह दूसरे सूर्य की तरह प्रतीत हो रहा है।
कृष्ण ने सत्राजित से कहा, ‘यह मणि तुम्हारे योग्य नहीं है। तुम इसे महाराज उग्रसेन को दे दो।’ सत्राजित ने मणि देने से इंकार कर दिया। कुछ दिनों के पश्चात सत्राजित का अनुज प्रसेनजित उस मणि को पहनकर वन में आखेट के लिए गया। वह घोड़े पर सवार था। संयोग की बात कि एक पर्वत की गुफा के पास एक सिंह ने घोड़े सहित प्रसेनजित को मार डाला। उस गुफा के भीतर ऋक्षराज जाम्बवान रहते थे। जाम्बवान जब बाहर निकले, तो उनकी दृष्टि सूर्य के समान चमकती स्यमंतक मणि पर पड़ी। उन्होंने उस मणि को ले जाकर खेलने के लिए अपने बालकों को दे दिया।
कई दिनों के पश्चात प्रसेनजित, जब वन से लौटकर नहीं आया, तो सत्राजित ने संपूर्ण द्वारिका में यह खबर फैला दी कि कृष्ण ने उसके भाई की हत्या करा कर स्यमंतक मणि ले ली। कृष्ण के कानों में भी यह खबर पड़ी। वे अपने ऊपर लगे हुए कलंक को मिटाने के लिए प्रसेनजित और स्यमंतक मणि की खोज के लिए वन में गए। उनके साथ द्वारिका के कुछ श्रेष्ठ नागरिक भी थे। कृष्ण प्रसेनजित की खोज करते हुए पर्वत की गुफा के पास पहुंचे। गुफा के द्वार पर प्रसेनजित और उसके घोड़े की मृत देह देखकर उन्होंने सोचा, हो न हो, स्यमंतक मणि को ले जाने वाला इस गुफा के भीतर ही रहता है।
कृष्ण अपने साथियों को गुफा के द्वार पर छोड़ कर, अकेले ही गुफा के भीतर प्रविष्ट हो गए। उन्होंने अपने साथियों से कहा, ‘जब तक मैं लौटकर न आऊं, गुफा के द्वार पर मेरी प्रतीक्षा करें।’ कृष्ण ने गुफा के भीतर देखा, कुछ बालक स्यमंतक मणि से खेल रहे थे। कृष्ण ने बालकों के हाथ से स्यमंतक मणि ले ली। जाम्बवान ने कृष्ण को रोका, तो दोनों में युद्ध होने लगा। यह युद्ध 21 दिनों तक लगातार चला, किंतु हार-जीत का निर्णय नहीं हो सका।
उधर गुफा के द्वार पर प्रतीक्षा करने वाले कृष्ण के साथी कुछ दिन प्रतीक्षा करने के बाद द्वारिका लौट गए। उन्होंने द्वारिकावासियों को बताया कि किस प्रकार कृष्ण एक गुफा के भीतर घुस गए और अब तक बाहर नहीं निकले। द्वारिकावासी शंकित हो उठे। उधर 21 दिनों के पश्चात भी जब जाम्बवान कृष्ण को पराजित नहीं कर सके, तो उन्हें निश्चय हो गया कि यह साधारण पुरुष नहीं हैं। तब कृष्ण ने जाम्बवान को विष्णु और त्रेता के राम रूप में दर्शन दिए।
जाम्बवान कृष्ण के सामने नतमस्तक हो गए। उन्होंने कृष्ण को स्यमंतक मणि तो दी ही, उनके साथ अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह भी कर दिया। कृष्ण ने सत्राजित को स्यमंतक मणि देकर अपने ऊपर लगे हुए कलंक को मिटा दिया। सत्राजित ने कृष्ण के शौर्य और उनकी निश्छलता पर मुग्ध होकर उन्हें मणि देने के साथ ही अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह भी उनसे करा दिया। कृष्ण ने मणि को लेना स्वीकार नहीं किया। उन्होंने मणि सत्राजित को लौटा दी।




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