Quote Of The Day: किस परिवार में दोष नहीं, सुख हमेशा बना नहीं रहता.. पढ़ें चाणक्य के अनमोल विचार
आचार्य चाणक्य की नीतियां आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। उन्हें आज के समय में भी एक महान दार्शनिक, कुशल कूटनीतिज्ञ, प्रभावशाली राजनीतिज्ञ और प्रख्यात अर्थशास्त्री के रूप में याद किया जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने जीवन के लगभग हर पहलू का गहन विश्लेषण किया है। नीचे पढ़ें उनके अमोल विचार…

Aaj Ka Vichar: आचार्य चाणक्य की नीतियां आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। उन्हें आज के समय में भी एक महान दार्शनिक, कुशल कूटनीतिज्ञ, प्रभावशाली राजनीतिज्ञ और प्रख्यात अर्थशास्त्री के रूप में याद किया जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने जीवन के लगभग हर पहलू का गहन विश्लेषण किया है। अपने एक श्लोक के माध्यम से उन्होंने यह भी बताया है कि किन लोगों के प्रति आवश्यकता से अधिक लगाव रखना व्यक्ति के आत्मसम्मान को आहत कर सकता है। ऐसे ही आज हमने चाणक्य नीति के कुछ श्लोक चुने हैं, जो एक ऐसा जीवन मंत्र है जिसे हमेशा याद रखना चाहिए और अपने व्यवहार में उतारना चाहिए।
श्लोक 1
निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत्।
खगा वीतफलं वृक्षं भुक्त्वा चाभ्यागता गृहम् ॥
इस श्लोक के जरिए आचार्य चाणक्य कहते हैं कि वेश्या निर्धन पुरुष को छोड़ देती है, प्रजा पराजित या कमजोर राजा का साथ त्याग देती है, पक्षी फलहीन वृक्षों को छोड़कर उड़ जाते हैं और अचानक आया अतिथि भोजन करने के बाद घर से विदा हो जाता है। आचार्य चाणक्य यहां यह समझाना चाहते हैं कि अधिकांश संबंध तभी तक बने रहते हैं, जब तक उनसे किसी न किसी स्वार्थ की पूर्ति होती रहती है।
श्लोक 2
दुराचारी दुरादृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः।
यन्मैत्रीक्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्रं विनश्यति ॥
अर्थ
इस श्लोक का भाव यह है कि जो व्यक्ति बुरे आचरण वाला हो, बिना कारण दूसरों को नुकसान पहुंचाता हो और दूषित वातावरण में रहता हो, ऐसे व्यक्ति से जो कोई मित्रता करता है, वह शीघ्र ही पतन को प्राप्त होता है। यह श्लोक सिखाता है कि मनुष्य का पतन उसकी गलत संगति से बहुत जल्दी हो सकता है, इसलिए हमेशा अच्छे लोगों का साथ ही जीवन को सही दिशा देता है।
श्लोक 3
कस्य दोषः कुलेनास्ति व्याधिना के न पीडितः।
व्यसनं के न संप्राप्तं कस्य सौख्यं निरन्तरम् ॥
अर्थ
ऐसा कोई परिवार नहीं है जिसमें कोई दोष न हो, ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो कभी रोग से पीड़ित न हुआ हो, ऐसा कोई नहीं जिसे कभी दुख या कष्ट न मिला हो और ऐसा भी कोई नहीं जिसका सुख हमेशा बना रहता हो। इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में कोई भी पूर्ण नहीं है और न ही किसी का सुख हमेशा स्थायी रहता है, इसलिए परिस्थितियों को स्वीकार कर संतुलित जीवन जीना ही बुद्धिमानी है।
श्लोक 4
कोकिलानां स्वरो रूपं नारीरूपं पतिव्रतम्।
विद्यारूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम् ॥
अर्थ
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि कोयल की सुंदरता उसकी मधुर आवाज में होती है, स्त्री की सुंदरता उसके पतिव्रत धर्म में होती है, कुरूप व्यक्ति की सुंदरता उसकी विद्या होती है और तपस्वी की सुंदरता उसकी क्षमा में होती है।
श्लोक 5
लालयेत् पञ्चवर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्॥
अर्थ
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि बच्चे को पहले पांच साल तक प्रेम से पालना चाहिए, अगले दस साल तक उसे अनुशासन और शिक्षा देनी चाहिए, और जब वह सोलह वर्ष का हो जाए, तो उसके साथ मित्र जैसा व्यवहार करना चाहिए।
डिस्क्लेमरः इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।




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