Quote of the day: त्याग, गुण... मनुष्य की परख इन 4 बातों से होती हैं, गांठ बांध लें चाणक्य की ये बातें
aaj ka vichar: आचार्य चाणक्य ने अपने नीति शास्त्र में कई ऐसी बातें बताई हैं, जिसपर मनुष्य अगर अमल करें, तो वह हर कार्य में सफल हो जाता है। वो कहते हैं कि इंसान को हमेशा ईमानदार होकर सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए।

आचार्य चाणक्य ने अपने नीति शास्त्र में कई ऐसी बातें बताई हैं, जिसपर मनुष्य अगर अमल करें, तो वह हर कार्य में सफल हो जाता है। वो कहते हैं कि इंसान को हमेशा ईमानदार होकर सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए। आज हम आपको चाणक्य की कुछ बातों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें अगर आप अपने जीवन में उतार लेते हैं, तो इससे आपके लिए सफलता प्राप्ति की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
श्लोक 1:
"विषादप्यमृतं ग्राह्यममेध्यादपि काञ्चनम्।
नीचादप्युत्तमां विद्यां स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि।।"
इस श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जहरीली चीज से अमृत, गंदी जगह से सोना लिया जा सकता है। इसके साथ ही वह कहते हैं कि ज्ञान जहां से मिले वहीं से ले लेना चाहिए। इसमें कोई बुराई नहीं है।
श्लोक 2:
प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः ।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः ॥
इस श्लोक में चाणक्य कहते हैं कि प्रलय (महाविनाश) के समय समुद्र भी अपनी मर्यादा तोड़ देते हैं। वो किनारों को तोड़कर जल-थल एक कर देता है। लेकिन सज्जन और साधु प्रलय जैसी कठिन परिस्थिति में भी अपनी मर्यादा और सिद्धांत नहीं छोड़ते। ऐसे लोग अपने चरित्र, मर्यादा और सिद्धांतों से समझौता नहीं करते। परिस्थितियां चाहे कितनी भी खराब क्यों न हों, अच्छे लोग हमेशा अपने अच्छे गुण बनाए रखते हैं।
श्लोक 3:
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते
निघर्षणच्छेदनतापताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते
त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥
इस श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह सोने (कनक) को चार तरीकों से परखा जाता है- घिसकर, काटकर, गर्म करके और पीटकर, उसी तरह मनुष्य की भी चार बातों से पहचान होती है- त्याग, आचरण (शील), गुण और कर्म।
श्लोक 4:
क: काल: कानि मित्राणि को देश: कौ व्ययागमौ। कस्याऽडं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुंहु:।।
इस श्लोक का अर्थ है कि व्यक्ति को जीवन में बार-बार कुछ महत्वपूर्ण बातों पर सोच-विचार करते रहना चाहिए, ताकि वह सही निर्णय ले सके और गलतियों से बच सके।
- अभी कौन सा समय (काल) चल रहा है,
- मेरे सच्चे मित्र कौन हैं,
- मैं किस स्थान (देश) में हूं,
- मेरी आय और खर्च क्या है,
- मैं किस परिस्थिति में हूं,
- और मेरी अपनी क्षमता (शक्ति) कितनी है।
श्लोक 5:
"नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम् ।
छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः॥"
चाणक्य नीति के इस श्लोक में बताया गया है कि इंसान को जरूरत से ज्यादा सीधा या भोला नहीं होना चाहिए। ऐसा होने पर लोग उसका आसानी से फायदा उठा लेते हैं। इसे समझाने के लिए उदाहरण दिया गया है कि जंगल में सबसे पहले सीधे पेड़ों को ही काटा जाता है, जबकि टेढ़े-मेढ़े पेड़ अक्सर बच जाते हैं। उसी तरह, जो लोग बहुत ज्यादा सरल होते हैं, उन्हें लोग जल्दी नुकसान पहुंचा देते हैं, इसलिए समझदारी और सतर्कता जरूरी है।
डिस्क्लेमरः इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।




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