Quote Of The Day: बहुत ज्यादा सुंदरता, घमंड और दान बनते हैं विनाश की वजह, पढ़ें चाणक्य के विचार
aaj ka vichar: आचार्य चाणक्य एक महान विद्वान थे। उनकी नीतियां केवल उस समय के लिए नहीं थीं, बल्कि आज के जीवन में भी उतनी ही सार्थक हैं। चाणक्य यह बताते हैं कि जीवन में संतुलन सबसे जरूरी है। अ

Aaj Ka Vichar: आचार्य चाणक्य एक महान विद्वान थे। उनकी नीतियां केवल उस समय के लिए नहीं थीं, बल्कि आज के जीवन में भी उतनी ही सार्थक हैं। चाणक्य यह बताते हैं कि जीवन में संतुलन सबसे जरूरी है। अगर कोई व्यक्ति हर समय सिर्फ अच्छा बनने की कोशिश करता है और अपनी सीमाओं का ध्यान नहीं रखता, तो लोग उसका फायदा उठा सकते हैं। इसलिए अच्छाई जरूरी है, लेकिन उतनी ही जितनी सही हो। आज हमने चाणक्य नीति के कुछ श्लोक चुने हैं, जो एक ऐसा जीवन मंत्र है जिसे हमेशा याद रखना चाहिए और अपने व्यवहार में उतारना चाहिए।
श्लोक 1
अतिरुपेणवैसीताअतिगर्वेणरावणः।
अतिदानाद्वलिर्वद्धोह्यतिसर्वत्र वर्जयेत्॥
अर्थ- आचार्य चाणक्य इस श्लोक में कहते हैं कि सीता जी कीअत्यधिक सुंदरता ही उनके हरण का कारण बना। यानी कोई भी चीज जरूरत से ज्यादा हो जाए, तो वह समस्या बन सकती है। रावण का अत्यधिक घमंड ही उसके विनाश का कारण बना। मतलब, जरूरत से ज्यादा अहंकार हमेशा नुकसान देता है। राजा बलि ने अत्यधिक दान किया, जिसके कारण वे बंधन में पड़ गए। यानी जरूरत से ज्यादा उदारता भी कभी-कभी हानि पहुंचा सकती है। इसका अर्थ है कि बहुत ज्यादा सुंदरता, बहुत ज्यादा घमंड, या बहुत ज्यादा दान, ये सब भी नुकसान का कारण बन सकते हैं। इसलिए जीवन में हर चीज संतुलित होनी चाहिए, किसी भी चीज की अति नहीं करनी चाहिए।
श्लोक 2
कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्।
को विदेशः सुविद्यानांकः परः प्रियवादिनाम्।।
अर्थ- वो कहते हैं जो सक्षम होते हैं, उनके लिए कोई भी भार भारी नहीं होता। यानी मजबूत और योग्य व्यक्ति हर जिम्मेदारी उठा सकता है। जो मेहनती और प्रयास करने वाले होते हैं, उनके लिए कोई भी जगह दूर नहीं होती। मेहनती इंसान अपने लक्ष्य तक पहुंच ही जाता है, दूरी मायने नहीं रखती। जो विद्वान (ज्ञान वाले) होते हैं, उनके लिए कोई भी स्थान पराया नहीं होता। ज्ञान आपको हर जगह सम्मान दिलाता है। जो मीठा और अच्छा बोलते हैं, उनके लिए कोई भी व्यक्ति पराया नहीं होता। अच्छे व्यवहार और मधुर वाणी से हर कोई अपना बन जाता है।
श्लोक 3
एकेनापि सुवृक्षेण दह्यमानेन गन्धिना।
वासितं तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा॥
अर्थ- जैसे एक सुगंधित पेड़ के जलने पर उसकी खुशबू पूरे जंगल में फैल जाती है। ठीक वैसे ही एक कुपुत्र पूरे परिवार की छवि खराब कर सकता है।
श्लोक 4
एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना।
दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा॥
अर्थ- आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जैसे एक सूखा पेड़ आग लगने पर पूरे जंगल को जला देता है, वैसे ही एक बुरा व्यक्ति (कुपुत्र) पूरे परिवार की प्रतिष्ठा और सुख को नष्ट कर सकता है।
डिस्क्लेमरः इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।




साइन इन