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भबानीपुर में वोटर के बदलते सुर, ममता बनर्जी को नंदीग्राम का रीकैप दिखा सकती है BJP; डबल चुनौती

पश्चिम बंगाल की भबानीपुर सीट हमेशा से तृणमूल कांग्रेस की पहचान नहीं रही। आजादी के बाद दशकों तक दक्षिण कोलकाता की यह सीट कांग्रेस का मजबूत गढ़ थी और राज्य के कई नेताओं का राजनीतिक आधार रही। कई वर्षों तक यह सीट कांग्रेस के प्रभाव में रही।

Tue, 7 April 2026 12:56 PMNisarg Dixit लाइव हिन्दुस्तान
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भबानीपुर में वोटर के बदलते सुर, ममता बनर्जी को नंदीग्राम का रीकैप दिखा सकती है BJP; डबल चुनौती

5 साल पुरानी बात है। 2 मई 2021, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित हो रहे थे। राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की तो जीत तय नजर आ रही थी, लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सीट पर संकट के बादल मंडरा रहे थे। सभी की नजरें नंदीग्राम के रिजल्ट पर थीं। चुनाव के नतीजे देर रात सामने आए और स्पष्ट हुआ कि सीएम ममता के ही करीबी शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें मात दे दी है। अब यही हाई प्रोफाइल मुकाबला इस बार भी राजनीति के गलियारों में चर्चा में होगा, क्योंकि मैदान टीएमसी सुप्रीम के गढ़ भबानीपुर का है। हालांकि, इस बार उनका मुकाबला सिर्फ भाजपा ही नहीं, बल्कि SIR के बाद बदली हुई मतदाता सूची से भी है।

कभी कांग्रेस का गढ़ था भबानीपुर

भबानीपुर सीट हमेशा से तृणमूल कांग्रेस की पहचान नहीं रही। आजादी के बाद दशकों तक दक्षिण कोलकाता की यह सीट कांग्रेस का मजबूत गढ़ थी और राज्य के कई नेताओं का राजनीतिक आधार रही। पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने इस सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में और बाद में निर्दलीय के तौर पर चुनाव जीता। कांग्रेस के अन्य दिग्गज नेताओं जैसे मीरा दत्ता गुप्ता और रथिन तालुकदार ने भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया, जिससे भबानीपुर कांग्रेस का प्रमुख शहरी गढ़ बन गया। कई वर्षों तक यह सीट कांग्रेस के प्रभाव में रही, जबकि वामपंथी दल उस समय केवल 1969 में थोड़े समय के लिए यहां जीत हासिल कर सके

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1972 बना भबानीपुर सीट का टर्निंग पॉइंट

साल 1972 में परिसीमन के बाद चुनावी नक्शे से ही गायब हो गई थी। लगभग चार दशकों तक यह सीट केवल राजनीतिक चर्चाओं में ही बनी रही। जब 2011 के परिसीमन के दौरान यह सीट दोबारा अस्तित्व में आयी, तब पश्चिम बंगाल की राजनीति भी बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही थी। उसी वर्ष वाम मोर्चा के 34 साल के शासन का अंत हुआ और ममता बनर्जी का दौर शुरू हुआ।

ऐसे बनी टीएमसी का गढ़

नए सिरे से बनी भबानीपुर सीट जल्द ही तृणमूल के उभार से जुड़ गई। बनर्जी ने 2011 के पहले चुनाव में अपने करीबी सहयोगी सुब्रत बक्शी को इस सीट से उम्मीदवार बनाया। बक्शी ने 64 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर माकपा के नारायण जैन को करीब 50,000 वोट से हराया और भबानीपुर को तृणमूल का मजबूत गढ़ बना दिया। इसके बाद बक्शी ने सीट छोड़ दी ताकि तृणमूल की भारी जीत के बाद मुख्यमंत्री बनीं बनर्जी उपचुनाव के जरिए विधानसभा में प्रवेश कर सकें।

SIR का असर

SIR यानी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद भबानीपुर में मतदाता सूची से 47,000 से अधिक नाम हटाए गए हैं, जबकि 14,000 से अधिक मतदाता सत्यापन में हैं। नामों को हटाने की यह संख्या राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि यह उस 58,000 से अधिक वोटों के अंतर से लगभग 11,000 कम है, जिससे बनर्जी ने 2021 के उपचुनाव में जीत हासिल की थी। पीटीआई भाषा की रिपोर्ट के मुताबिक, अनुमान है कि यहां 42 प्रतिशत मतदाता बंगाली हिंदू, 34 प्रतिशत गैर-बंगाली हिंदू और करीब 24 प्रतिशत मुस्लिम हैं।

बीते साल 4 नवंबर को जब SIR शुरू हुई, तो सीट पर मतदाताओं की संख्या 2 लाख 6 हजार 295 थी। बाद में 16 दिसंबर को एक ड्राफ्ट लिस्ट जारी हुई, जिसमें 44 हजार 786 नाम कटने की जानकारी सामने आई। हालांकि, अंतिम सूची में करीब 2 हजार 324 नाम और जुड़े और संख्या 47 हजार के पार पहुंच गई।

14 हजार वोटरों का खेल

14,154 मतदाताओं को 'विचाराधीन' श्रेणी में रखा गया है, जिन पर अंतिम निर्णय दस्तावेज के वेरिफिकेशन पर निर्भर है। अब अगर इन नामों को और सूची में से हटा दिया जाता है, तो असर नतीजों पर भी पड़ सकता है।

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BJP क्यों लगा रही है उम्मीद

19 मार्च को भाजपा ने भबानीपुर सीट पर चुनाव प्रचार का आगाज किया था। तब अधिकारी ने कहा था, 'मैं 25,000 मतों के अंतर से जीतूंगा। जनता ने आज दिखा दिया है कि यहां कोई चुनौती नहीं है।'

कहा जा रहा है कि भाजपा की उम्मीद की बड़ी वजह सीट की बदलती डेमोग्राफी या जनसांख्यिकी है। कभी एकजुट बंगाली 'भद्रलोक' मतदाताओं के इस गढ़ में अब गैर बंगाली समुदाय भी शामिल हो गए हैं। इनमें हिंदी बोलने वाली प्रवासी, युवा समेत कई वर्ग हैं, जिन्हें लेकर कहा जाता है कि उनका टीएमसी से सीधा जुड़ाव नहीं है।

यहां मिली भाजपा को राह

अब जब नए समुदाय भबानीपुर के मतदाता बने तो टीएमसी के पुराने जनाधार को झटका लगा और भाजपा को संभावनाएं नजर आईं। न्यूज18 की रिपोर्ट के अनुसार, 2016 के विधानसभा चुनाव के बाद से ही भबानीपुर में 40 से 60 हजार टीएमसी विरोधी वोट देखे गए हैं, जो भाजपा, सीपीएम और कांग्रेस के खाते में गए।

माना जा रहा है कि भाजपा की उम्मीदें बड़े स्तर पर गैर बंगाली मतदाताओं पर टिकी हुईं हैं। इनमें करीब 46 प्रतिशत गुजराती, पंजाबी और हिंदी भाषी हैं। इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा यहां के 8 में से 5 वार्ड में बढ़त बनाए हुए थी।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि से तो भाजपा को बहुमत के साथ सरकार बनाने के लिए 170 सीट जीतनी होंगी, लेकिन केवल भबानीपुर में अधिकारी की जीत से ही राज्य की राजनीति में अपने आप परिवर्तन आ जाएगा।

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TMC का बड़ा टारगेट

TMC के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने 60 हजार से ज्यादा वोटों से भबानीपुर सीट पर जीत का लक्ष्य तय किया है। उन्होंने कहा, 'जब ममता बनर्जी ने पहले यहां चुनाव लड़ा था, तब हमने 231 बूथों पर जीत हासिल की थी। इस बार हमें उस आंकड़े को पार करना होगा और कम से कम 232 बूथों पर जीत सुनिश्चित करनी होगी।' पश्चिम बंगाल में दो चरणों में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को मतदान होगा तथा मतों की गिनती चार मई को होगी।

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