बंगाल में टूटेगा वाम मोर्चा? हुमायूं कबीर ने माकपा को दिया गठबंधन का खुला ऑफर
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के लिए वाम मोर्चा- इंडियन सेक्यूलर फ्रंट गठबंधन लगभग तय होने के बावजूद बुधवार को जनता उन्नयन पार्टी के संस्थापक हुमायूं कबीर की ओर से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट के सामने एक नई पेशकश रखने से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के लिए वाम मोर्चा- इंडियन सेक्यूलर फ्रंट (आईएसएफ) गठबंधन लगभग तय होने के बावजूद बुधवार को जनता उन्नयन पार्टी के संस्थापक हुमायूं कबीर की ओर से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट (माकपा) के सामने एक नई पेशकश रखने से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। कबीर ने पार्टी से वाम मोर्चा से बाहर निकलने और इसके बजाय उनके तथा आईएसएफ के साथ सीधा समझौता करने का आग्रह किया है। कबीर ने दावा किया कि उन्होंने माकपा के प्रदेश सचिव मोहम्मद सलीम को पहले ही एक संदेश भेज दिया है, जिसमें उन्होंने माकपा और आईएसएफ के साथ गठबंधन में 2026 का चुनाव लड़ने की इच्छा व्यक्त की है।
कबीर ने हालांकि स्पष्ट किया कि वह एक सामूहिक इकाई के रूप में वाम मोर्चा को शामिल करने वाली किसी भी व्यवस्था के लिए सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि मैं चाहता हूं कि माकपा और आईएसएफ 2026 में हमारे साथ मिलकर लड़ें। लेकिन मैं वाम मोर्चा के साथ गठबंधन के पक्ष में नहीं हूं। उन्होंने कहा कि वह श्री सलीम के जवाब का सात मार्च तक इंतजार करेंगे।
कबीर की यह पहल 2026 के चुनावों के लिए आईएसएफ के साथ वाम मोर्चे के गठबंधन को औपचारिक रूप देने के तुरंत बाद आई है। हालांकि महीनों से संभावित गठबंधन को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं, लेकिन मंगलवार को इसकी पुष्टि हो गई कि वाम मोर्चा एक बार फिर आईएसएफ के साथ साझेदारी करेगा। हालांकि, सीटों के बंटवारे की व्यवस्था अभी तय होनी बाकी है। इस घटनाक्रम ने कबीर और सलीम से जुड़े एक पुराने विवाद की यादें ताजा कर दी हैं। लोकसभा चुनावों से पहले, दोनों के बीच एक बैठक ने वामपंथी खेमे के कुछ वर्गों में तीखी आलोचना पैदा की थी, विशेष रूप से तब जब कबीर पर राजनीतिक विरोधियों द्वारा प्रचार के दौरान बाबरी मस्जिद के मुद्दे को उठाने का आरोप लगाया गया था।
उस बैठक को माकपा नेताओं के एक वर्ग ने अच्छी तरह से स्वीकार नहीं किया था। गौरतलब है कि अलीमुद्दीन स्ट्रीट स्थित माकपा के पार्टी मुख्यालय ने तब बातचीत को 'सकारात्मक' बताने से परहेज किया था। इसके बाद कबीर ने स्वयं घोषणा की थी कि वह वामपंथियों के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। माकपा ने तब इस मामले पर चुप्पी साधे रखी थी। इस बीच, नौशाद सिद्दीकी के नेतृत्व वाले आईएसएफ ने चुनाव पूर्व स्पष्टता मांगते हुए वामपंथी नेतृत्व को बार-बार पत्र लिखे थे। लंबे समय तक, वामपंथियों ने सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई, जिससे इस बात पर अटकलें लगाई जाने लगीं कि क्या गठबंधन वास्तव में हो पाएगा।
कबीर का ताजा प्रस्ताव माकपा से अपने पुराने वाम मोर्चा भागीदारों (आरएसपी और फॉरवर्ड ब्लॉक) से दूरी बनाने और एक नए गठबंधन की तलाश करने का आग्रह करके विपक्षी खेमे की रूपरेखा को फिर से तैयार करने की कोशिश करता है। माकपा के नेतृत्व में 1977 में गठित वाम मोर्चा ने हर विधानसभा चुनाव एक एकीकृत समूह के रूप में लड़ा है। कबीर द्वारा माकपा को उस ऐतिहासिक व्यवस्था को तोड़ने का आह्वान राज्य में विकसित हो रहे समीकरणों में एक महत्वपूर्ण मोड़ दे दिया है।
लेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




साइन इन