ममता बनर्जी की हार की छह वजहें, कैसे भवानीपुर में भाजपा ने ढहाया दीदी का किला
भवानीपुर सीट पर भाजपा के शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को शिकस्त दी है। ममता 15,105 वोटों से यह चुनाव हारी हैं। आइए जानते हैं उन छह वजहों के बारे में, जो भवानीपुर में ममता की हार की वजह बनीं...

पश्चिम बंगाल में भवानीपुर की सीट ममता बनर्जी का गढ़ मानी जाती रही है। इससे पहले भी बंगाल की राजनीति में यह सीट काफी अहम रही है। भवानीपुर ने ही साल 1970 में, सिद्धार्थ शंकर रॉय के रूप में बंगाल को पहला कांग्रेसी मुख्यमंत्री दिया। वहीं, तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख चेहरों, सु्ब्रता मुखर्जी और शोभोनदेव चट्टोपाध्याय ने भी इसी सीट से चुनाव लड़ा। अब इसी सीट पर टीएमसी को सबसे बड़ा झटका भी लगा है। भाजपा के शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को शिकस्त दी है। ममता 15,105 वोटों से यह चुनाव हारी हैं। आइए जानते हैं उन छह वजहों के बारे में, जो भवानीपुर में ममता की हार की वजह बनीं...
सत्ता विरोधी लहर का असर
एंटी इनकम्बेंसी एक ऐसा फैक्टर है जो अगर किसी सरकार के खिलाफ हो तो उसकी सबसे सुरक्षित सीट भी सुरक्षित नहीं रह जाती है। कुछ ऐसा ही इस बार ममता बनर्जी के साथ हुआ है। यही भवानीपुर सीट है जो 2021 में ममता के लिए सुरक्षित सीट थी। उनके करीबी शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने इस्तीफा देकर दीदी के लिए जगह खाली की थी। फिर ममता ने यहां चुनाव लड़ा और विधानसभा पहुंची थीं। लेकिन तीसरा टर्म आते-आते, ममता के लिए यह सीट भी सेफ नहीं रह गई और इसका खामियाजा उन्हें हारकर चुकाना पड़ा।
शुभेंदु अधिकारी फैक्टर
टीएमसी की तरफ तो ममता सीएम फेस थीं। लेकिन भाजपा ने इस चुनाव में कोई चेहरा घोषित नहीं किया था। इसके बावजूद अमित शाह ने शुभेंदु अधिकारी को निर्देश दिया कि वह ममता के खिलाफ मैदान में उतरें। असल में शुभेंदु, नंदीग्राम में पहले ही ममता बनर्जी को मात दे चुके थे। ऐसे में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को अंदाजा था कि अगर कोई ममता को मात देने का दम रखता है तो वह हैं शुभेंदु अधिकारी। यह फैक्टर काम कर गया और ममता को अपने गढ़ में मुंह की खानी पड़ी।
वोट शेयर में बड़ी गिरावट
एक और चीज जो ममता बनर्जी के खिलाफ गई वो थी उनके वोट शेयर में गिरावट। जहां 2021 में ममता बनर्जी का वोट शेयर 72 फीसदी था, वहीं, साल 2026 में उनका वोट प्रतिशत गिरकर 42 फीसदी पर आ गया। यह साफ दिखाता है कि ममता का वोट बैंक भाजपा की तरफ खिसक गया। ममता बंगाल की अन्य सीटों पर अपने उम्मीदवारों के लिए कैंपेनिंग करती रहीं, लेकिन भवानीपुर में उनकी ही जमीन खिसक गई। वैसे 2024 के लोकसभा चुनाव में ही इसकी झलक मिल गई थी। तब भवानीपुर के आठ वार्डों में से पांच वार्ड भाजपा के पक्ष में गए थे।
भाजपा की रणनीति
भवानीपुर को लेकर भाजपा ने खास रणनीति बना रखी थी। भाजपा ने टीएमसी के डर के खिलाफ चुनाव का माहौल बनाया। उसकी यह रणनीति काम भी कर गई। भाजपा ने ममता के खिलाफ निजी हमले से पूरी तरह से परहेज किया। उन्होंने बंगाल में बदलाव और विजन पर पूरी तरह से फोकस किया। दूसरी तरफ वोटर लगातार बदलाव की बातें करते रहे। भ्रष्टाचार और टीएमसी द्वारा फैलाए जा रहे भय को लेकर लोग मुखर रहे। लोगों में गुस्सा भी काफी था क्योंकि टीएमसी के निचले स्तर के नेताओं ने पार्टी की ताकत का दुरुपयोग किया।
एसआईआर की क्या भूमिका
एसआईआर भी एक अहम फैक्टर रहा। पूरे बंगाल में एसआईआर के जरिए वोटर लिस्ट की सफाई की गई और बोगस वोटर्स को हटाया गया। अभी तक गड़बड़ वोटर लिस्ट, निवर्तमान सरकारों के लिए किसी हथियार की तरह काम करती रही है। चाहे वो लेफ्ट हो या फिर टीएमसी, सभी ने इसका खूब दुरुपयोग किया। लेकिन इस बार वोटर लिस्ट में सुधार के बाद भवानीपुर में टीएमसी का दावा कमजोर पड़ गया।
आरजीकर की घटना का असर
आरजीकर रेप और मर्डर केस के बाद बंगाल में यह पहला चुनाव था। भाजपा ने सटीक रणनीति के तहत आरजीकर पीड़िता की मांग रत्ना देबनाथ को टीएमसी उम्मीदवार के खिलाफ खड़ा किया। इसके बाद सरकारी अस्पताल में हुई इस बेहद दर्दनाक घटना की तरफ फिर से लोगों का ध्यान गया। पहले से ही भड़के हुए लोग और ज्यादा भड़क उठे। वहीं, इसने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ माहौल बनाने में और ज्यादा मदद की।




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