Uttarakhand seeks Centre permission to cut over 19,000 Sal trees due to hoplo infestation देहरादून में 'साल' के 19 हजार पेड़ों पर मंडरा रहा खतरा, काटने के लिए सरकार ने केंद्र से मांगी अनुमति, Uttarakhand Hindi News - Hindustan
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देहरादून में 'साल' के 19 हजार पेड़ों पर मंडरा रहा खतरा, काटने के लिए सरकार ने केंद्र से मांगी अनुमति

मंत्री ने बताया कि मॉनसून के मौसम में बाकी बचे पेड़ों पर 'ट्री ट्रैप ऑपरेशन' चलाया जाएगा। इस प्रक्रिया में 'साल' के कुछ स्वस्थ पेड़ों को काटकर चार-चार फुट लंबे लट्ठों में बदल दिया जाता है, जिन्हें फिर बारिश के पानी में रख दिया जाता है।

Fri, 3 April 2026 12:47 AMSourabh Jain पीटीआई, ऋषिकेश, उत्तराखंड
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देहरादून में 'साल' के 19 हजार पेड़ों पर मंडरा रहा खतरा, काटने के लिए सरकार ने केंद्र से मांगी अनुमति

उत्तराखंड के देहरादून वन प्रभाग में मौजूद 'साल' के जंगलों में मौजूद करीब 19 हजार से ज्यादा पेड़ों पर एक बड़ा संकट मंडरा रहा है और राज्य सरकार ने इनके काटने की अनुमति मांगी है। इसकी वजह बताते हुए राज्य के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने बताया कि इस इलाके में मौजूद इन पेड़ों को 'साल बोरर' नामक कीट के लार्वा ने काफी नुकसान पहुंचाया है, ऐसे में राज्य सरकार अन्य पेड़ों को बचाने व संक्रमण रोकने के लिए एक 'ट्री ट्रैप ऑपरेशन' चलाना चाहती है। इसके लिए राज्य सरकार ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से यहां मौजूद 19 हजार से ज्यादा 'साल' के पेड़ों को काटने की अनुमति मांगी है।

वन विभाग को देहरादून के थानो, आशारोड़ी और झाझरा रेंज में साल के पेड़ों के खराब होने की सूचना मिली थी। इसके बाद भारतीय वन अनुसंधान संस्थान (FRI) की टीम ने जांच की, जिसमें 19,170 पेड़ों के 'हॉप्लो' कीट से संक्रमित होने का पता चला। वन मंत्री ने बताया कि इनमें से कुछ पेड़ तो अपनी ऊपरी डालियों तक सूख चुके हैं, इसलिए उन्हें काटना पड़ेगा।

कीट का लार्वा पेड़ कों खोखला कर देता है

विशेषज्ञों का कहना है कि हॉप्लो कीट का लार्वा, साल के पेड़ के तने के अंदर मौजूद 'जाइलम' ऊतकों को काटकर सुरंग बना देता है। जाइलम वह ऊतक होता है, जो जड़ों द्वारा सोखे गए पानी और खनिज लवणों को पौधे के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने का काम करता है। इसके नष्ट होने से पेड़ अंदर से खोखला हो जाता है और पेड़ धीरे-धीरे सूखकर मर जाते हैं। कई पेड़ों की हालत इतनी खराब है कि वे ऊपर (कैनोपी) तक पूरी तरह सूख चुके हैं, जिन्हें काटना अब अनिवार्य हो गया है।

मॉनसून में चलाया जाएगा ऑपरेशन

मंत्री ने बताया कि मॉनसून के मौसम में बाकी बचे पेड़ों पर 'ट्री ट्रैप ऑपरेशन' चलाया जाएगा। इस प्रक्रिया में 'साल' के कुछ स्वस्थ पेड़ों को काटकर चार-चार फुट लंबे लट्ठों में बदल दिया जाता है, जिन्हें फिर बारिश के पानी में रख दिया जाता है। इन साल के लट्ठों से निकलने वाली महक 'होप्लो' कीड़ों को अपनी ओर खींचती है। फिर इन कीड़ों को चिमटी की मदद से पकड़कर मिट्टी के तेल (केरोसिन) में डाल दिया जाता है, जिससे वे मर जाते हैं। यह एक बड़े पैमाने पर चलाया जाने वाला अभियान है, जिसमें अक्सर महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों की मदद ली जाती है।

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विशेषज्ञ बोले- यह गंभीर चिंता का विषय

विशेषज्ञों के अनुसार, वन प्रभाग में इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों का 'होप्लो' कीट से प्रभावित होना, पारिस्थितिक संतुलन के नजरिए से एक गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने बताया कि यह कीट कठफोड़वा पक्षियों के लिए भोजन का एक प्राकृतिक स्रोत है, और इस तरह यह साल के पेड़ों पर होने वाले हमलों को रोकने में मदद करता है। इससे पहले, 1990 के दशक की शुरुआत में भी वन प्रभाग के 'थानो रेंज' में 'होप्लो' कीटों का ऐसा ही प्रकोप देखने को मिला था।

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क्या असाधारण बारिश की वजह से पहुंचा नुकसान

विशेषज्ञ यह सवाल भी उठा रहे हैं कि क्या स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र में आए किसी बदलाव या जलवायु परिवर्तन के प्रभावों ने साल के पेड़ों को हुए इस भारी नुकसान में कोई भूमिका निभाई है। पिछले साल उत्तराखंड में असाधारण रूप से भारी बारिश हुई थी, और विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक वर्षा को 'होप्लो' कीटों के प्रकोप के लिए ज़िम्मेदार कई कारकों में से एक माना जाता है।

मंत्री ने भी 'होप्लो' के प्रकोप के पीछे के कारणों की जांच करने और इसके संभावित समाधानों की पहचान करने के लिए एक व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया।

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