UPCL की लापरवाही से 5 अरब की बिजली बर्बाद, बिना रीडिंग 385 करोड़ के बिल थमाए
कैग की रिपोर्ट में कई बड़े खुलासे हुए हैं। यूपीसीएल की लापरवाही से प्रदेश की 5 अरब की बिजली बर्बाद हो गई। बिना रीडिंग 385 करोड़ के बिल थमाए गए। वहीं, देहरादून स्मार्ट सिटी में भी करोड़ों के घपले की बात सामने आई है।

कैग की रिपोर्ट में यूपीसीएल की बड़ी लापरवाही उजागर हुई है। रिपोर्ट कहती है कि रुड़की, लक्सर और रुद्रपुर क्षेत्र में 964 मिलियन यूनिट बिजली लाइन लॉस की वजह से बेकार हो गई, जिससे 488 करोड़ का नुकसान हो गया। विधानसभा में पेश की गई सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के प्रतिवेदन में इस पर आपत्ति जताई गई है। साथ ही देहरादून स्मार्ट सिटी के नाम पर करोड़ों के दुरपयोग का मामला सामने आया है। ठेकेदारों को दिए 19 करोड़ रुपये एडवांस वापस नहीं लिए।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यूपीसीएल में बिजली चोरी रोकने के लिए प्रकोष्ठ गठित करने का निर्णय लिया गया था लेकिन उसमें पर्याप्त पुलिस बल तैनात नहीं किया गया। साथ ही छापेमारी दल और राजस्व निरीक्षण विभाग भी अस्तित्व में नहीं आ पाया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यूपीसीएल की ओर से बड़ी संख्या में लोगों को बिना रीडिंग के बिल दिए जा रहे हैं। वर्ष 2021- 22 से 2023- 24 के दौरान केवल 31 प्रतिशत मीटरों की जांच की गई। जबकि एक लाख 13 हजार उपभोक्ताओं को बिना रीडिंग के आधार पर बिल दिए गए। यही नहीं बकाया भुगतान में देरी करने वालों के कनेक्शन काटने में भी देरी की गई। इसके साथ ही कैग की ओर से यूपीसीएल के बिलिंग सिस्टम, वसूली सिस्टम और निगरानी सिस्टम पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि यूपीसीएल के अधीक्षण और मुख्य अभियंता निरीक्षण कम कर रहे हैं।
बैठक तक नहीं कराई जा रही
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की रिपोर्ट में कैग ने कहा कि पूर्व सैनिक कल्याण निगम के बोर्ड में किसी भी महिला को शामिल नहीं किया गया है। जबकि उत्तराखंड बीज और तराई विकास निगम ने वर्ष 2022- 23 में साल में एक भी बोर्ड बैठक आयोजित नहीं कराई गई। जबकि निदेशक मंडल की साल में चार बैठकें होना अनिवार्य है।
बिना बिजली के धूल फांकते स्मार्ट स्कूलों में कंप्यूटर
कैग रिपोर्ट के अनुसार स्मार्ट स्कूल परियोजना पर 5.91 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसके तहत तीन स्कूलों में कंप्यूटर लैब, स्मार्ट बोर्ड लगाए गए। लेकिन बिजली बिल न भरने के कारण लगाए गए उपकरण उपयोग में नहीं आ सके और बेकार पड़े रहे। वहीं 2.62 करोड़ रुपये की लागत से लगाए गए 50 पर्यावरणीय सेंसर राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए। इस कारण उनका डेटा उपयोगी नहीं रहा। इसी तरह 4.85 करोड़ रुपये की लागत से खरीदे गए ई-रिक्शा और ई-बस चार्जिंग स्टेशन भी बिना इस्तेमाल के बेकार पड़े रहे। वहीं सेंसर आधारित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन मॉड्यूल पर 4.55 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन यह प्रणाली शुरू ही नहीं हो पाई।
देहरादून स्मार्ट सिटी के कार्यों में करोड़ों का दुरुपयोग
कैग की रिपोर्ट में देहरादून स्मार्ट सिटी लिमिटेड की विभिन्न परियोजनाओं में किए गए कामों, भुगतानों में बड़ी वित्तीय अनियमितताओं, गलत भुगतान और योजनाओं के कमजोर क्रियान्वयन का खुलासा हुआ है। कैग की 2018 से 2024 के बीच के कामों के ऑडिट में करीब 75 करोड़ की अनियमिताएं मिली हैं।
कई जगह धनराशि का दुरुपयोग हुआ, कुछ मामलों में ठेकेदारों को अधिक भुगतान किया गया, जबकि कई परियोजनाओं पर खर्च होने के बावजूद उनका लाभ जनता तक नहीं पहुंच पाया। स्मार्ट सिटी की सीमा से ही बाहर भी काम कर दिया गया और एडवांस भुगतान तक कर दिया। अफसर सरकारी धन की वसूली तक नहीं कर सके। कैग की इस रिपोर्ट में स्मार्ट सिटी को कभी भी पूर्ण कालिक सीईओ ना मिलने और हमेशा डीएम देहरादून को प्रभार देने पर सवाल उठाए गए हैं। स्मार्ट सिटी के कामों में अनियमितता का खामियाजा कहीं न कहीं आम आदमी को भुगतना पड़ा
ठेकेदार से अनुबंध समाप्त, 19 करोड़ रुपये एडवांस वापस नहीं लिए
स्मार्ट सिटी मिशन के निर्धारित एरिया बेस्ड डेवलपमेंट (एबीडी) क्षेत्र से बाहर 19.47 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए। ठेकेदार के साथ अनुबंध समाप्त होने के बाद भी उससे 19.06 करोड़ रुपये के एडवांस की वसूली नहीं हो पायी। जिससे ये बजट पूरी तरह से बर्बाद हो गया। इसे भी कैग ने बड़ी वित्तीय अनियमितता और सरकारी धन का दुरुपयोग बताया। वहीं मोबिलाइजेशन एडवांस पर ब्याज की सही गणना न करने के कारण 81.12 लाख रुपये कम वसूले गए। परियोजना की धनराशि को बचत खाते के बजाय करंट अकाउंट में रखने के कारण करीब 6.20 करोड़ रुपये के ब्याज का नुकसान हुआ। इसे भी सरकारी धन का दुरुपयोग माना गया।
नियम विरुद्ध दी 105 करोड़ की धनराशि
कैग रिपोर्ट के अनुसार दून लाइब्रेरी परियोजना में जीएसटी के दोहरे दावों और अधिक दरों के कारण 34.70 लाख रुपये का अतिरिक्त भुगतान किया गया। इसके अलावा परियोजना प्रबंधन सलाहकार (पीएमसी) को भी अनुचित भुगतान किया गया। जिसमें 34.70 लाख रुपये बिना उपस्थिति सत्यापन के और 35.84 लाख रुपये अयोग्य विशेषज्ञों की तैनाती के लिए दिए गए। इस प्रकार कुल 70.54 लाख रुपये का भुगतान किया गया।
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