इस तीर्थ स्थल में श्राद्ध से मिलता है आठ गुना अधिक पुण्य, 9/11 के बाद विदेशियों ने भी कराया था पिंडदान
पौराणिक मान्यता है कि बदरीनाथ के पास ब्रह्मकपाल में तर्पण करने से आठ गुना अधिक पुण्य मिलता है। यहां हर साल श्राद्ध पर बड़ी संख्या में विदेशी भी पिंडदान के लिए पहुंचते हैं।

बदरीनाथ धाम के ब्रह्मकपाल घाट पर श्राद्ध करने की सनातनी परंपरा अब वैश्विक रंग ले रही है। मान्यता है कि यहां पितरों का तर्पण करने से अन्य स्थानों की तुलना में आठ गुना अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि न सिर्फ देशभर से, बल्कि अमेरिका, रूस, कनाडा और यूरोप जैसे देशों से भी लोग हजारों मील का सफर तय कर यहां अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान कर रहे हैं। यहीं भगवान शिव ने भी ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाई थी, इसलिए इस तीर्थ स्थल को मोक्षभूमि माना जाता है।
पितरों के लिए प्रार्थना करने को बदरीनाथ से महज 500 मीटर दूर अलकनंदा के तट पर बने ब्रह्मकपाल पर हर साल श्राद्ध पक्ष में भारत के कोने-कोने से लोग पहुंचते हैं। तीर्थ पुरोहित अरविंद हटवाल बताते हैं ब्रह्मकपाल में बीते कुछ सालों से विदेशी श्रद्धालुओं की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है।
9/11 हमले के बाद 15 विदेशियों ने किया था पिंडदान
पुरोहित महावीर प्रसाद हटवाल कहते हैं सितंबर 2001 में अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले के बाद पहली बार 15 विदेशियों ने यहां सामूहिक रूप में पिंडदान किया था। इसके बाद धीरे-धीरे यहां विदेशियों की संख्या बढ़ती रही। इस साल अमेरिका, रूस, यूक्रेन, फ्रांस, कनाडा जैसे देशों के लोग ब्रह्मकपाल की इस पवित्र धरती पर पितरों के लिए प्रार्थना कर चुके हैं।
पौराणिक मान्यता
बदरीनाथ के पूर्व धर्माधिकारी आचार्य भुवन उनियाल बताते हैं कि पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान शिव ने क्रोध में आकर ब्रह्मा के पांच सिरों में से एक को अपने त्रिशूल से काट दिया, तो वह सिर उनके त्रिशूल पर चिपक गया। ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए भोलेनाथ पृथ्वी लोक में भटक रहे थे। जब वे बदरीनाथ के इस स्थान पर पहुंचे, तो त्रिशूल से ब्रह्मा का सिर नीचे गिर गया। तभी से यह स्थान ‘ब्रह्मकपाल’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
यहां श्रद्धा से मिलता है मोक्ष
तीर्थ पुरोहित विवेक सती, अजय सती और सुबोध हटवाल बताते हैं, जिन लोगों की अकाल मृत्यु हो जाती है, उनके लिए ब्रह्मकपाल में श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति की मान्यता। यही मान्यता विदेशी श्रद्धालुओं को भी यहां खींच लाती है।
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