Namami Gange Programme CAG highlights poor implementation in Uttarakhand कैग ने उत्तराखंड सरकार की कमियां उजागर कीं, नमामि गंगा कार्यक्रम रिपोर्ट विधानसभा में पेश, Uttarakhand Hindi News - Hindustan
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कैग ने उत्तराखंड सरकार की कमियां उजागर कीं, नमामि गंगा कार्यक्रम रिपोर्ट विधानसभा में पेश

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की एक रिपोर्ट ने उत्तराखंड में नमामि गंगा कार्यक्रम में खामियों को उजागर किया है। रिपोर्ट में सीवेज प्रबंधन, अपशिष्ट निपटान, निगरानी तंत्र और जन जागरुकता प्रयासों में कमियों का हवाला दिया गया है।

Wed, 11 March 2026 11:39 AMSubodh Kumar Mishra हिन्दुस्तान टाइम्स, देहरादून
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कैग ने उत्तराखंड सरकार की कमियां उजागर कीं, नमामि गंगा कार्यक्रम रिपोर्ट विधानसभा में पेश

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की एक रिपोर्ट ने उत्तराखंड में नमामि गंगा कार्यक्रम में खामियों को उजागर किया है। रिपोर्ट में सीवेज प्रबंधन, अपशिष्ट निपटान, निगरानी तंत्र और जन जागरुकता प्रयासों में कमियों का हवाला दिया गया है।

मंगलवार को राज्य विधानसभा में पेश की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य गंगा समिति और स्वच्छ गंगा राज्य मिशन ने स्थानीय समुदायों के सहयोग से सीवेज उपचार अवसंरचना की पर्याप्त योजना और कार्यान्वयन नहीं किया। इसमें यह भी कहा गया है कि राज्य सरकार ने गंगा के तटवर्ती शहरों में सीवरेज सुविधाओं में सुधार के लिए संसाधन उपलब्ध नहीं कराए। इस वजह से कई सीवेज उपचार संयंत्र (एसटीपी) या तो घरेलू सीवर नेटवर्क से जुड़े नहीं हैं या आंशिक रूप से जुड़े हुए हैं।

यह रिपोर्ट 2018-19 से 2022-23 की अवधि को कवर करते हुए 2023-24 में फ्लैगशिप कार्यक्रम के ऑडिट पर आधारित है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों में पर्याप्त क्षमता नहीं थी, जिस वजह से बिना ट्रीटमेंट के सीवेज गंगा में बहाया जा रहा था।

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कैग ने कहा कि उत्तराखंड जल संस्थान ने निर्माण और संचालन में खामियों के कारण 18 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों को अपने अधीन लेने से इनकार कर दिया। इसमें यह भी कहा गया है कि सीवेज स्लज के उचित प्रबंधन की भी उपेक्षा की गई थी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य गंगा समिति एसटीपी (शव उपचार संयंत्र) की समय पर सुरक्षा जांच करने में विफल रही, जिसके कारण अनावश्यक जानमाल का नुकसान हुआ और नमामि गंगा परियोजना की संपत्तियों को नुकसान हुआ।

राज्य के गंगा तटवर्ती शहरों में कार्यक्रम के जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन का आकलन करने वाली इस जांच में यह बात सामने आई कि जन जागरुकता अभियानों में कमी के कारण स्वच्छ गंगा राज्य मिशन के श्मशान घाट काफी हद तक अप्रयुक्त रहे। इसमें परियोजना के तहत वन संरक्षण संबंधी कार्यों में सीमित प्रगति की ओर भी इशारा किया गया। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि नियोजित खर्च का केवल 16 प्रतिशत ही कार्यान्वित किया गया।

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ऑडिट में पाया गया कि गंगा के शहरों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन अपर्याप्त है। कचरे को अक्सर नदी की ढलानों पर फेंक दिया जाता था या उचित प्रसंस्करण के बजाय जलाकर निपटाया जाता था। इस वजह से कचरा वापस नदी में बह जाता था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सीटीपी (जल उपचार संयंत्र) में जल उपचार की गुणवत्ता खराब है। अधिकांश संयंत्र एनजीटी या भारत सरकार के मानदंडों का पालन करने में विफल रहे हैं। देवप्रयाग तक गंगा के जल की गुणवत्ता को 'ए' श्रेणी में रखा गया है। ऋषिकेश में यह 2019 से 2023 तक 'बी' श्रेणी में ही रही। हालांकि, कोविड-19 काल (2020-21) में सुधरकर 'ए' श्रेणी में हो गई। हरिद्वार में नदी के जल की गुणवत्ता लेखापरीक्षा अवधि के दौरान लगातार 'बी' श्रेणी में ही बनी रही। श्रेणी ए और श्रेणी बी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा निर्धारित सतही जल गुणवत्ता मानकों को दर्शाते हैं।

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इस ऑडिट में 42 परियोजनाओं को शामिल किया गया। इनमें 25 सीवेज प्रबंधन परियोजनाएं, 15 नदी तट विकास और घाट सफाई परियोजनाएं, एक वृक्षारोपण परियोजना और एक औद्योगिक प्रदूषण को लक्षित परियोजना शामिल हैं।

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