सरकारी कर्मचारियों को शेयर और संपत्ति खरीद की देनी होगी जानकारी, योगी कैबिनेट का फैसला
योगी कैबिनेट ने सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली में संशोधन को मंजूरी दी है। अब कर्मचारियों को दो महीने के मूल वेतन से अधिक के शेयर निवेश और किसी भी अचल संपत्ति की खरीद-फरोख्त की जानकारी देनी होगी। नियमों का उल्लंघन करने पर विभागीय कार्रवाई का प्रावधान किया गया है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई कैबिनेट बैठक में भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत सरकारी कर्मचारियों के लिए कड़े नियम लागू कर दिए गए हैं। अब प्रदेश के सरकारी सेवकों के लिए अपनी चल-अचल संपत्ति, विशेषकर शेयर बाजार में निवेश और जमीन की खरीद-फरोख्त की जानकारी देना अनिवार्य होगा। कैबिनेट ने इसके लिए 'उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली, 1956' में महत्वपूर्ण संशोधनों को मंजूरी दे दी है।
शेयर और म्यूचुअल फंड निवेश पर कड़ी नजर
कैबिनेट के फैसले के अनुसार, अब यदि कोई सरकारी कर्मचारी एक कैलेंडर वर्ष के दौरान अपने छह महीने के मूल वेतन (Basic Pay) से अधिक की राशि शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, डिबेंचर या बॉन्ड में निवेश करता है, तो उसे इसकी सूचना अनिवार्य रूप से अपने विभाग को देनी होगी। सरकार का मानना है कि इस कदम से कर्मचारियों की आय के ज्ञात स्रोतों और उनके निवेश के बीच पारदर्शिता बनी रहेगी।
अब हर साल देनी होगी संपत्ति की जानकारी
कर्मचारियों को दो महीने के मूल वेतन से ज्यादा की चल संपत्ति यानी वाहन, सोना-चांदी आदि की खरीद की जानकारी देनी होगी। पहले एक महीने के मूल वेतन का नियम था। इसके अलावा हर साल अपनी संपत्ति की जानकारी देनी अनिवार्य होगी। पहले पांच साल में एक बार देनी होती थी। कर्मचारियों की सेवान नियमावली के नियम-24 में किए गए बदलावों के तहत हर साल अपनी संपत्ति का ब्योरा पोर्टल पर ऑनलाइन दर्ज करना होगा। ऐसा न करने वाले कर्मचारियों की पदोन्नति (प्रमोशन) रोकी जा सकती है और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है।
उच्चतर न्यायिक सेवा में भी बड़े बदलाव
कैबिनेट ने 'उत्तर प्रदेश उच्चतर न्यायिक सेवा नियमावली, 1975' में संशोधन के प्रस्ताव को भी हरी झंडी दी है। इसके तहत अब न्यायिक अधिकारियों की भर्ती और प्रोन्नति की प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी बनाया जाएगा। न्यायिक सेवा के अधिकारियों के लिए भी आचरण और संपत्ति के विवरण से जुड़े नियमों को राज्य सरकार की नई भ्रष्टाचार विरोधी नीतियों के अनुरूप ढाला गया है।
उत्तर प्रदेश उच्चतर न्यायिक सेवा में पदोन्नति के लिए श्रेष्ठता-सह-ज्येष्ठता के आधार पर और उपयुक्तता परीक्षा उत्तीर्ण करने पर सिविल जज (सीनियर डिवीजन) में से मानक दिव्यांगजन के लिये आरक्षण के नियम के अधीन कोटा 65 प्रतिशत के स्थान पर 50 प्रतिशत निर्धारित कर दिया गया है।
इसके अलावा उत्तर प्रदेश उच्चतर न्यायिक सेवा में पदोन्नति के लिए सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की सीमित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से श्रेष्ठता के आधार पर उस संवर्ग में तीन वर्ष की निरन्तर सेवा रखने वाले और उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा में सात वर्ष की सेवा रखने वाले में से मानक दिव्यांगजन के लिए आरक्षण के नियम के अध्यधीन कोटा 10 प्रतिशत के स्थान पर 25 प्रतिशत निर्धारित कर दिया गया है।
भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की तैयारी
बैठक में कार्मिक विभाग के जिस प्रस्ताव को मंजूरी मिली है, उसका उद्देश्य सरकारी तंत्र में 'अघोषित आय' पर लगाम लगाना है। अब तक कई कर्मचारी अपनी बेनामी संपत्ति या भारी निवेश को छिपा ले जाते थे, लेकिन अब 'डिजिटल लेजर' और अनिवार्य सूचना प्रणाली के माध्यम से विभाग उनकी आर्थिक गतिविधियों पर नजर रख सकेगा।




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