UP SIR: मृत बीएलओ के परिवारों को क्या मिलेगी सुविधा? सरकार का आया जवाब
शिक्षकों, लेखपालों और कुछ अन्य कर्मियों को बीएलओ की ड्यूटी पर लगाया गया है। निर्वाचन आयोग के अधीन होते हुए बीएलओ के बारे में किसी भी तरह का फैसला लेने का अधिकार उसके पास है। संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने कहा कि मृत बीएलओ को सरकारी कर्मी मानते हुए सुविधाएं दी जाएंगी।

उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार मृत बीएलओ के परिवारों को सरकारी कर्मियों की तरह वही सुविधाएं देगी। बीएलओ मौजूदा समय चुनाव आयोग के अधीन काम कर रहा है, इसलिए उनके बारे में निर्णय लेने का अधिकार आयोग के पास है। संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने मंगलवार को विधानसभा में यह जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि मौजूदा समय विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का काम चल रहा है। इस काम में सरकारी कर्मियों को बीएलओ की ड्यूटी में लगाया गया है। संविधान में दी गई व्यवस्था के आधार पर मतदाता सूची तैयार की जाती है। निर्वाचन अधिकारी इस काम में किसी भी कर्मी को प्रतिनियुक्ति के आधार पर नियुक्ति कर सकता है। इसके आधार पर ही शिक्षकों, लेखपालों और कुछ अन्य कर्मियों को बीएलओ की ड्यूटी पर लगाया गया है। निर्वाचन आयोग के अधीन होते हुए बीएलओ के बारे में किसी भी तरह का फैसला लेने का अधिकार उसके पास है। उन्होंने कहा कि रही सुविधाएं देने की बात, तो मृत बीएलओ को सरकारी कर्मी मानते हुए सुविधाएं दी जाएंगी।
कांग्रेस की अराधना मिश्रा मोना ने कहा कि एसआईआर के दौरान प्रदेश में अब तक 10 बीएलओ की मौतें हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि एसआईआर को लेकर आखिर इतनी जल्दबाजी क्यों है? वर्ष 2003 में भी एसआईआर हुआ था। लेकिन उस समय लोगों का नाम शामिल किया गया, न कि हटाया गया था। इस समय होने वाले एसआईआर में नाम शामिल करने के स्थान पर हटाया जा रहा है।
अराधना मिश्ना ने कहा कि प्रशासनिक लापरवाही के चलते बीएलओ की मौतें हुईं। इसकी जवाबदेही बनती है। सरकार ने इन मौतों पर अभी तक कोई घोषणा नहीं की। सपा के नगीना बिजनौर के विधायक मनोज पारस, जैदपुर गौरव रावत, बाराबंकी के धर्म राज सिंह यादव, कानपुर कैंट के मोहम्मद हसन रूमी ने भी बीएलओ की मौत और एसआईआर में गड़बड़ी का मामला उठाया।




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