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सिर्फ यूरिन के सैंपल से होगी कैंसर की पहचान, बीएचयू के वैज्ञानिकों ने खोजा बायोमार्कर

काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के वैज्ञानिकों ने यूरिनरी ब्लैडर कैंसर की पहचान के लिए एक किफायती और सटीक बायोमार्कर की खोज की है। अब एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी महंगी जांचों के बजाय यूरिन सैंपल के जरिए कैंसर और उसकी स्टेज का पता लगाया जा सकेगा।

Thu, 7 May 2026 06:34 AMYogesh Yadav वाराणसी, कार्यालय संवाददाता
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सिर्फ यूरिन के सैंपल से होगी कैंसर की पहचान, बीएचयू के वैज्ञानिकों ने खोजा बायोमार्कर

कैंसर की पहचान को लेकर बीएचयू के वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है। पहले जिस कैंसर की पहचान के लिए एमआरआई, सीटी स्कैन या सिस्टोकॉपी जैसी महंगी जांच की जरूरत होती थी वह अब सिर्फ यूरिन के सैंपल के परीक्षण से ही सटीक तरीके से की जा सकेगी। बीएचयू के वैज्ञानिकों ने यूरिन में मौजूद एक्सोसोमल माइक्रोआरएनए की खोज की है। इससे न सिर्फ कैंसर की पहचान हो सकेगी, बल्कि उसकी स्टेज भी पता चलेगी। वैज्ञानिक भविष्य में प्रेगनेंसी किट की तरह इसके लिए जांच किट बनाने में जुटे हैं।

यूरिनरी ब्लडैर कैंसर (यूरिन की थैली का कैंसर) की पहचान के लिए अभी तक उपलब्ध संसाधनों से एक मरीजों पर कम से कम आठ से दस हजार रुपये खर्च होते हैं। इसके बाद बाद भी कई बार रिपोर्ट सही नहीं होती है। इसको देखते हुए बीएचयू के विज्ञान संस्थान के जैव प्रौद्योगिकी विभाग और आईएमएस बीएचयू के यूरोलॉजी विभाग ने संयुक्त रूप से शोध किया। शोध के दौरान कैंसर मरीजों और स्वस्थ लोगों के यूरिन के नमूनों की तुलना की गई।

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नेक्स्ट जेनरेशन सीक्वेंसिंग तकनीक से पता चला कि कैंसर मरीजों में माइक्रोआरएनए की संख्या और विविधता ज्यादा होती है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि जैसे-जैसे ट्यूमर बढ़ता है, माइक्रोआरएनए के स्तर में भी बदलाव होता है। यानी ये बायोमार्कर न सिर्फ बीमारी का पता लगाने में मददगार हैं, बल्कि उसकी गंभीरता समझने में भी उपयोगी हो सकते हैं। यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका नेचर स्प्रिंगर में प्रकाशित हुआ है। शोध में स्कूल ऑफ बायोटेक्नोलॉजी के डॉ. समरेन्द्र कुमार सिंह तथा यूरोलॉजी विभाग डॉ. ललित कुमार, डॉ. गरिमा सिंह, डॉ. अनिल कुमार, सृष्टि भट्टाचार्य शामिल हैं।

अधिक संवेदनशीलता प्रदर्शित की

प्रमुख अन्वेषक डॉ. समरेन्द्र कुमार सिंह ने कहा कि शोध में तीन माइक्रोआरएनए के संयोजन (पैनल) ने 90% से अधिक संवेदनशीलता प्रदर्शित की। उन्होंने कहा कि केवल यूरिन के नमूने से कैंसर की पहचान भविष्य में जांच प्रक्रिया को अधिक सरल और रोगी-अनुकूल बना सकती है। उन्होंने कहा कि माइक्रोआरएनए आधारित यह तकनीक न केवल कैंसर की पहचान में, बल्कि उसके विकास को समझने में भी सहायक है, जिससे बेहतर उपचार रणनीतियां विकसित की जा सकती हैं।

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आशाजनक बदलाव के संकेत

डॉ. ललित कुमार (सह-प्रमुख अन्वेषक एवं यूरोलॉजिस्ट) ने कहा कि इस प्रकार की खोजें कैंसर निदान के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती हैं। समाज को व्यापक रूप से लाभान्वित कर सकती हैं। अभी तक जहां आठ से दस हजार रुपये खर्च होते हैं, इसमें महत 250 से तीन सौ रुपये में सैंपल जांच हो सकेगी। इन निष्कर्षों से बड़े स्तर पर बहु-केंद्रित अध्ययनों के लिए एक मजबूत आधार तैयार होता है, जिनके माध्यम से भविष्य में इसे क्लिनिकल निदान में उपयोग होने की संभावनाएं हैं।

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