Shooting in the foot for promotion and fame Questions raised in High Court about UP Police Operation Langda प्रमोशन, शोहरत के लिए पैर में गोली मार रहे; हाईकोर्ट में यूपी पुलिस के ऑपरेशन लंगड़ा का एनकाउंटर, Uttar-pradesh Hindi News - Hindustan
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प्रमोशन, शोहरत के लिए पैर में गोली मार रहे; हाईकोर्ट में यूपी पुलिस के ऑपरेशन लंगड़ा का एनकाउंटर

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी में हो रहे एनकाउंटर को सवाल खड़ा किया है। कोर्ट ने कहा है कि प्रमोशन और शोहरत के लिए यूपी पुलिस एनकाउंटर कर रही है। ऐसा आचरण पूरी तरह अस्वीकार्य है क्योंकि दंड देने का अधिकार केवल कोर्ट के पास है।

Sat, 31 Jan 2026 02:39 PMPawan Kumar Sharma विधि संवाददाता, प्रयागराज
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प्रमोशन, शोहरत के लिए पैर में गोली मार रहे; हाईकोर्ट में यूपी पुलिस के ऑपरेशन लंगड़ा का एनकाउंटर

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में लगातार हो रहे पुलिस एनकाउंटर को लेकर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस सिर्फ प्रमोशन और शोहरत के लिए मुठभेड़ का सहारा ले रही है, जो पूरी तरह अस्वीकार्य है क्योंकि दंड देने का अधिकार केवल अदालत के पास है। यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने मिर्जापुर के राजू उर्फ राजकुमार और दो अन्य की जमानत अर्जियों पर सुनवाई के दौरान दिया।

कोर्ट ने डीजीपी और गृह सचिव से जवाब तलब किया कि क्या किसी पुलिस अधिकारी को आरोपियों के पैरों में गोली मारने का कोई लिखित या मौखिक आदेश दिया गया है। अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस अक्सर मामूली मामलों में भी मुठभेड़ का दिखावा करते हुए अंधाधुंध फायरिंग कर देती है, जबकि इन मुठभेड़ों में किसी अधिकारी को चोट नहीं लगी। इससे आग्नेयास्त्र के उपयोग और उसकी अनुपातिकता पर सवाल उठते हैं।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत लोकतांत्रिक राज्य है, जहां कानून का शासन चलता है। संविधान में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की भूमिकाएं स्पष्ट हैं। इसलिए पुलिस द्वारा न्यायिक अधिकारों का अतिक्रमण स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने टिप्पणी की कि कुछ पुलिस अधिकारी अपने पद और अधिकार का दुरुपयोग कर फर्जी मुठभेड़े को वरिष्ठ अधिकारियों की वाहवाही और जनता की सहानुभूति पाने के लिए चित्रित करते हैं।

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जमानत अर्जी में अदालत ने यह निर्देश दिया कि मुठभेड़ों से संबंधित एफआईआर दर्ज की गई है या नहीं, और घायल का बयान मजिस्ट्रेट या चिकित्साधिकारी के समक्ष लिया गया या नहीं। पुलिस ने जवाब दिया कि एफआईआर तो दर्ज है, लेकिन घायल का बयान न मजिस्ट्रेट के सामने लिया गया और न ही किसी चिकित्साधिकारी के समक्ष। पहले एक सब-इंस्पेक्टर को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया था, अब यह जिम्मेदारी एक इंस्पेक्टर को सौंपी गई है।

अनदेखी पर एसपी-एसएसपी भी होंगे अवमानना के दोषी

कोर्ट ने चेताया कि यदि किसी जिले में पुलिस एनकाउंटर के दौरान हुई मौत या गंभीर चोट के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, तो केवल एनकाउंटर का नेतृत्व करने वाला अधिकारी ही नहीं, बल्कि संबंधित जिले के एसपी, एसएसपी या पुलिस आयुक्त भी अवमानना के दोषी माने जाएंगे। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में विभागीय कार्रवाई के साथ अवमानना की कार्यवाही भी की जा सकती है।

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