शंकराचार्य ने बिना संगम स्नान माघ मेला छोड़ा, प्रयागराज से काशी रवाना हुए अविमुक्तेश्वरानंद
मौनी अमावस्या पर हुए विवाद के बाद से नाराज चल रहे शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बिना स्नान ही माघ मेला अचानक छोड़ दिया है। बुधवार की सुबह वह प्रयागराज से काशी के लिए रवाना हो गए।

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने माघ मेला अचानक छोड़ दिया है। बुधवार की सुबह माघ मेले को छोड़ने का फैसला करने के बाद शंकराचार्य प्रयागराज से काशी के लिए रवाना हो गए। मौनी अमावस्या पर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से विवाद के बाद उन्होंने संगम में स्नान भी नहीं किया था। इसके बाद से अपने शिविर में भी नहीं गए थे। बुधवार को 11वें दिन भी वह शिविर के बाहर ही धरने पर डटे रहे। बताया जा रहा है कि मंगलवार देर रात समर्थकों से बातचीत के बाद शंकराचार्य ने माघ मेला छोड़ने का फैसला किया। यह पहला मौका है जब माघ मेले में आने के बाद शंकराचार्य बिना स्नान ही वापस चले गए हैं।
माघ मेले को छोड़ने से पहले शंकराचार्य ने कहा कि हमने अन्याय का विरोध किया है और न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कहा कि प्रयाग की इस धरती पर लोग आध्यात्मिक शांति के लिए आते हैं। आज ऐसी विपदा और भारी मन लेकर लौटना पड़ रहा है, जिसकी हमने कभी कल्पना नहीं की थी। जो भी यहां पर हुआ है उसने न सिर्फ हमारी आत्मा को झकझोर है, बल्कि न्याय और मानवता के प्रति हमारे विश्वास पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। संगम की इन लहरों में स्नान करना केवल धार्मिक क्रिया नहीं बल्कि आत्मा की संतुष्टि का एक मार्ग भी है।
शंकराचार्य ने कहा कि आज मन इतना व्यथित है कि इस संकल्प को अधूरा छोड़कर यहां से विदा ले रहे हैं। जब हृदय में क्षोभ और ग्लानि का ज्वार हो तो स्वजल की शीतलता भी अर्थहीन हो जाती है। हम अपने समाज और सनातन के अनुयायियों के साथ ही मेला प्राधिकरण के अफसरों और शासन तक यह बात पहुंचाना चाहते हैं कि आज हम यहां से जा रहे हैं लेकिन अपने पीछे सत्य की गूंज और वह अनुत्तरित प्रश्न को छोड़कर जा रहे हैं जो प्रयाग की हवा में विद्यमान रहेंगे ही पूरे विश्व के वायुमंडल में मौजूद रहेंगे और उत्तर की प्रतीक्षा करेंगे।
इससे पहले अपने विरोध के दसवें दिन मंगलवार को उन्होंने दोहराया था कि वह मेला छोड़कर जाने वाले नहीं हैं।यदि चले गए तो तरह-तरह के अफवाह फैलाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि हम सनातनियों के सम्मान में, संतों के साथ हुए अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध माघ मास मेला तक यही बैठे रहेंगे। बोले कि इतने दिन बीत जाने के बाद भी किसी कर्मचारी अथवा अधिकारी के नहीं आने पर ऐसा लग रहा है कि प्रशासन की गलती नहीं है, बल्कि यह साबित हो गया है कि घटना हुकुमरान के इशारे पर की गई थी।
अपनी हत्या की आशंका भी जताई
शंकराचार्य ने आशंका जाहिर की है कि यहां उनकी हत्या भी हो सकती है। इससे पूर्व घटना वाले दिन भी उन्होंने हत्या की साजिश करने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा कि अगर उनकी हत्या हुई तो भी उन्हें ही दोषी ठहराया जाएगा। यदि किसी षड्यंत्र के तहत आपकी हत्या होती है तो जिम्मेदार कौन होगा ? इस प्रश्न पर शंकराचार्य ने कहा, किसी के मारे जाने पर यहां जिम्मेदारी कहां तय होती है। सवाल किया कि बीते महाकुम्भ में इतने लोग मारे गए किसी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध कोई कार्रवाई हुई क्या। किसी को जिम्मेदार ठहराया गया क्या? ऐसे ही हमारे मारे जाने पर भी कोई जिम्मेदारी तय नहीं होगी। दो-चार दिन मीडिया में खबरें चलेंगी, बाद में हमीं को दोषी बता दिया जाएगा। इन सब बातों से हम भयभीत होकर गोरक्षा की आवाज उठाना बंद नहीं करेंगे।




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