ट्रेनों में अब यात्रियों को नहीं लगेगा झटका, डिरेल होने की घटनाओं में आएगी कमी, जानिए कैसे
ट्रेनों में अब यात्रियों को झटका नहीं लगेगा। इसके लिए इंजीनियरिंग विभाग ने कवायद शुरू कर दी है। क्रॉसिंग पर पड़ने वाले जोड़ को हाईटेक मशीनों से वेल्ड करने से जर्क पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। पहियों के पटरी से उतरने की घटनाओं में भी काफी कमी आएगी।

UP News: रेलवे यात्रियों के लिए राहत की खबर है। अब उनकी यात्रा और अधिक आरामदायक होगी। रेलवे यात्रियों को ट्रेनों में अब जर्क (झटका) नहीं लगेगा। इसके लिए इंजीनियरिंग विभाग ने कवायद शुरू कर दी है। क्रॉसिंग पर पड़ने वाले जोड़ को हाईटेक मशीनों से वेल्ड करने से जर्क पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। इससे संरक्षा भी मजबूत होगी और पहियों के पटरी से उतरने की घटनाओं में भी काफी कमी आएगी।
अभी तक ट्रेन क्रॉसिंग पर पहुंचती है तो वहां जर्क महसूस होता है। अब ऐसा नहां होगा। पटरियों के बीच के गैप को किसी पदार्थ से भरने के बजाए पटरियां फैलाकर उन्हें आपस में जोड़ा जा रहा है। इससे पटरियों की मजबूती पूरी तरह से बरकरार रहती है और उस पर खुरदुरापन नहीं रहता है। पूर्वोत्तर रेलवे में 80 फीसदी सेक्शन में यह काम पूरा हो गया है। अफसरों का कहना है कि बाकी बचे 20 फीसदी रूटों और सेक्शन का काम जल्द ही पूरा कर लिया जाएगा। इस तरह का संरक्षा का काम करने वाला एनईआर सबसे पहला रेलवे है।
फ्लैश बट से जोड़ी जा रहीं पटरियां
पटरियों को जोड़ने के लिए रेलवे फ्लैश बट तकनीक का प्रयोग कर रहा है। इससे समय तो कम लगता ही है, मजबूती भी बनी रहती है। अभी तक रेलवे एंटी प्रक्रिया से पटरियों को जोड़ने के लिए वेल्डिंग करता था, जिसमें अधिक समय लगता था। वेल्डिंग के लिए ब्लॉक अधिक लेने के कारण ट्रेनें लेट होती थीं, लेकिन फ्लैश बट वेल्डिंग प्रक्रिया से कम समय के ब्लॉक में पटरियों को जोड़ दिया जाता है।
रेल की पैरेंट बॉडी के समान होती है वेल्ड सामग्री
फ्लैश बट वेल्डिंग अनिवार्य रूप से एक फोर्जिंग प्रक्रिया है और वेल्ड की सामग्री रासायनिक रूप से रेल की पैरेंट बॉडी के समान होती है। इसकी ताकत और अन्य विशेषताएं भी रेल की बॉडी के लगभग समान हैं। फ्लैश बट वेल्डिंग आम तौर पर कमजोर नहीं होती है। पहले फ्लैश बट वेल्डिंग प्रक्रिया सिर्फ कारखानों में ही की जाती थी। अब इसका इस्तेमाल पटरियों को जोड़ने के लिए किया जाता है।




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