Life imprisonment should be awarded only in rarest of rare cases of dowry deaths says High Court दहेज मृत्यु में विरलतम मामलों में ही दी जानी चाहिए उम्रकैद की सजा; हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, Uttar-pradesh Hindi News - Hindustan
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दहेज मृत्यु में विरलतम मामलों में ही दी जानी चाहिए उम्रकैद की सजा; हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि दहेज मृत्यु में विरलतम से विरल मामलों में ही उम्र कैद की सज़ा दी जानी चाहिए। जहां यह स्पष्ट हो कि पीड़िता की हत्या की गई है। साथ ही कोर्ट ने दहेज मृत्यु के आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए उसकी उम्रकैद की सजा को घटा दिया है।

Sat, 14 Feb 2026 07:59 AMPawan Kumar Sharma विधि संवाददाता, प्रयागराज
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दहेज मृत्यु में विरलतम मामलों में ही दी जानी चाहिए उम्रकैद की सजा; हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय ने कहा है कि दहेज मृत्यु में विरलतम से विरल मामलों में ही उम्र कैद की सज़ा दी जानी चाहिए। जहां यह स्पष्ट हो कि पीड़िता की हत्या की गई है। कोर्ट ने दहेज मृत्यु के आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए उसकी उम्रकैद की सजा को घटाकर अब तक जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया।

अदालत ने निर्देश दिया कि दोनों अभियुक्तों को तत्काल रिहा किया जाए। यह आदेश बिजनौर के चांदपुर के शकील अहमद और अन्य की अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सलील कुमार राय एवं न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने दिया।

अभियोजन के अनुसार, मृतका नाजिया की शादी 14 दिसंबर 2014 को शेरबाज उर्फ शादाब से हुई थी। आरोप था कि शादी के बाद ससुराल पक्ष ने मोटरसाइकिल और दो लाख रुपये की अतिरिक्त दहेज मांग की। 9 अप्रैल 2015 को कथित रूप से केरोसिन डालकर उसे जला दिया गया, जिससे वह 80 प्रतिशत तक झुलस गई और उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।

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केस पर संज्ञान के बाद फाइनल रिपोर्ट पर आदेश जरूरी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि यदि मजिस्ट्रेट ने आरोपपत्र (चार्जशीट) पर संज्ञान ले लिया हो और उसके बाद पुलिस आगे की जांच में फाइनल रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) दाखिल कर दे, तो अदालत उस रिपोर्ट की अनदेखी नहीं कर सकती।

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सही रिपोर्ट नहीं देने वाले 71 जिला जजों से जताई नाराजगी

एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों में वर्षों से लंबित चार्जशीट पर रिपोर्ट दाखिल करने में लापरवाही बरतने पर प्रदेश के अधिकतर जिला जजों पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदेशों की अनदेखी न्यायिक अनुशासन और न्याय व्यवस्था की बुनियाद को प्रभावित करती है।

गोंडा और बरेली ने समय विस्तार मांगा

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने प्रयागराज की उर्मिला मिश्रा की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 16 दिसंबर 2025 को प्रदेश के सभी जिला जजों को एक सप्ताह के भीतर ऐसी चार्जशीट की वर्षवार जानकारी देने का निर्देश दिया था, जिनमें वर्ष 2004 से 2024 तक आरोप तय नहीं हुए हैं। प्रत्येक आपराधिक न्यायालय से अलग-अलग आंकड़े देने को कहा गया था। कोर्ट को 75 में से 49 जिलों से रिपोर्ट प्राप्त हुई। गोंडा और बरेली ने समय विस्तार मांगा। जबकी 26 जिलों से कोई रिपोर्ट नहीं आई और न ही समय बढ़ाने का अनुरोध किया गया।

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