केजीएमयू डॉक्टर धर्मांतरण: निकाह पढ़ाने वाले काजी को हाईकोर्ट से राहत, गिरफ्तारी पर रोक
लखनऊ हाईकोर्ट ने केजीएमयू धर्मांतरण मामले में निकाह पढ़ाने वाले काजी सैयद जाहिद हसन राना की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि जब परिवार की मौजूदगी में निकाह हुआ और किसी ने शिकायत नहीं की, तो जबरन धर्मांतरण का आरोप प्रथम दृष्टया गलत है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) से जुड़े कथित अवैध धर्मांतरण मामले में बड़ा आदेश जारी किया है। न्यायालय ने मुख्य अभियुक्त रमीज मलिक की पत्नी का निकाह पढ़ाने वाले कथित काजी सैयद जाहिद हसन राना की गिरफ्तारी और उत्पीड़नात्मक कार्रवाई पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। जस्टिस अब्दुल मोईन और जस्टिस बबीता रानी की खंडपीठ ने इस मामले में राज्य सरकार से जवाब तलब किया है।
क्या है पूरा कानूनी विवाद?
यह मामला केजीएमयू के एक डॉक्टर के धर्मांतरण और निकाह से जुड़ा है, जिसमें रमीज मलिक को मुख्य अभियुक्त बनाया गया है। पुलिस का आरोप है कि सैयद जाहिद हसन राना ने मुख्य अभियुक्त की पत्नी का कथित रूप से जबरन धर्मांतरण कराया और फिर निकाह पढ़ाया। याचिककर्ता की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि वह मूल रूप से अरबी भाषा का जानकार है और उसने केवल निकाह पढ़ाने की रस्म पूरी की थी। याचिका में यह भी स्पष्ट किया गया कि निकाह के समय लड़की के माता-पिता और भाई स्वयं मौके पर मौजूद थे, इसलिए इसे जबरन या अवैध नहीं कहा जा सकता।
अपर महाधिवक्ता और बचाव पक्ष की दलीलें
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता एस.एम. सिंह रायकवार ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि अभियुक्त ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम (गैर कानूनी धर्मांतरण कानून) का उल्लंघन किया है और बिना प्रक्रिया के निकाह पढ़ाया।
वहीं, बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि याची प्राथमिकी (FIR) में नामजद भी नहीं था और उसे केवल जांच के दौरान दुर्भावनापूर्ण तरीके से घसीटा गया है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि जब परिवार की सहमति से निकाह हुआ, तो धर्मांतरण कानून की धाराएं लागू नहीं होतीं।
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी और राहत
दोनों पक्षों की जिरह सुनने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार की दलीलों पर असंतोष जताया। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया सरकार की बहस 'मिथ्या और गलत' प्रतीत होती है। कोर्ट ने गौर किया कि जब निकाह के समय लड़की के पिता स्वयं उपस्थित थे, तो अभी तक न तो लड़की ने और न ही उसके परिवार ने जबरन धर्मांतरण या निकाह की कोई एफआईआर दर्ज कराई है।
अदालत ने कहा कि जब प्रत्यक्ष रूप से कोई शिकायतकर्ता ही नहीं है, तो पुलिस की कार्रवाई संदेहास्पद लगती है। इन टिप्पणियों के साथ न्यायालय ने आरोपी काजी को अंतरिम राहत प्रदान कर दी।
अगली सुनवाई और प्रक्रिया
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को इस मामले में चार सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का समय दिया है। इसके बाद याची को प्रत्युत्तर (Rejoinder) दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मिलेगा। तब तक पुलिस आरोपी के खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठा सकेगी।




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