नाबालिग को बालगृह में रखना अवैध हिरासत नहीं; इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि यदि किसी नाबालिग लड़की को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के आदेश पर बाल गृह में रखा गया है, तो उसे अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता और ऐसे मामलों में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सुनवाई योग्य नहीं होती।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी नाबालिग लड़की को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के आदेश पर बाल गृह में रखा गया है, तो उसे ‘अवैध हिरासत’ नहीं माना जा सकता और ऐसे मामलों में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका सुनवाई योग्य नहीं होती।
न्यायमूर्ति संदीप जैन की पीठ ने यह आदेश उस याचिका पर दिया, जिसमें एक व्यक्ति ने दावा किया था कि उसकी पत्नी दीक्षा को उसकी इच्छा के विरुद्ध मथुरा के वृंदावन स्थित राजकीय बालिका गृह में रखा गया है और उसे उसकी कस्टडी दी जानी चाहिए। याची ने कहा कि दीक्षा उसकी विधिवत विवाहित पत्नी है और राज्य द्वारा उसे बालिका गृह में रखना अवैध है। वहीं, राज्य की ओर से प्रस्तुत अधिवक्ता ने दलील दी कि याची के खिलाफ नाबालिग से विवाह करने का आपराधिक मामला लंबित है। इसलिए दीक्षा को विधिक प्रक्रिया के तहत बालिका गृह में रखा गया है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दीक्षा को 18 दिसंबर 2025 को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी, संभल के आदेश से बालगृह भेजा गया था। यह आदेश किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत पारित हुआ है। चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को कानून के तहत न्यायिक शक्तियां प्राप्त हैं, और उसका आदेश न्यायिक आदेश माना जाएगा। कोर्ट ने पूर्व के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति की हिरासत न्यायिक आदेश के तहत है, तो उसे हैबियस कॉर्पस के जरिए चुनौती नहीं दी जा सकती। नाबालिग के हित और सुरक्षा सर्वोपरि हैं, और उसके संरक्षण की जिम्मेदारी सीडब्लूसी की होती है।
ऐसे आदेश के खिलाफ उचित उपाय अपील या पुनरीक्षण (रिवीजन) है, न कि हैबियस कॉर्पस याचिका। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि बाल हिरासत मामलों में हैबियस कॉर्पस केवल तभी लागू होता है जब हिरासत पूरी तरह अवैध हो और बच्चे के हित के विरुद्ध हो। इन तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने याचिका को अस्वीकार्य मानते हुए खारिज कर दिया।




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