MP-MLA मुकदमों की मॉनीटरिंग के लिए बनेगा पारदर्शी पोर्टल, इलाहाबाद हाई कोर्ट का निर्देश
सांसदों और विधायकों के खिलाफ यूपी की विशेष अदालतों में चल रहे आपराधिक मुकदमों के ट्रायल की प्रभावी मॉनीटरिंग के लिए इलाहाबाद हाई कोरदर्शी तंत्र का उचित पोर्टल तैयार करने के लिए हर कदम उठाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि काफी समय बीत चुका है इसलिए अब और देर न की जाए।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में सांसदों और विधायकों के खिलाफ विशेष अदालतों में चल रहे आपराधिक मुकदमों के ट्रायल की प्रभावी मॉनीटरिंग के लिए पारदर्शी तंत्र का उचित पोर्टल तैयार करने के लिए हर कदम उठाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि काफी समय बीत चुका है इसलिए अब और देर न की जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति एसडी सिंह और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने एमपी-एमएलए विशेष अदालतों को लेकर स्वत: कायम जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुधीर मेहरोत्रा ने इस मामले में समय मांगा। इस पर कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए तीन अप्रैल नियत की है। अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल और कार्यकारी शासकीय अधिवक्ता पतंजलि मिश्र ने बताया कि अब किसी का केस वापस लेने का मामला नहीं है। अपर महाधिवक्ता राहुल अग्रवाल ने पुराने लंबित आपराधिक केस ट्रायल की रिपोर्ट पेश कर बताया कि रूप चौधरी केस की मूल पत्रावली पुनरीक्षण याचिका में हुए आदेश के तहत तलब कर ली गई है। तीन साल बीत चुके हैं और सुनवाई रुकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी दिया था निर्देश
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस अहम आदेश से पहले सुप्रीम कोर्ट से भी ऐसा आदेश आ चुका है। साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले के तहत सभी हाई कोर्ट को जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों की निगरानी के लिए एक विशेष पीठ गठित करने का निर्देश दिया था। ताकि ऐसे मुकदमों का शीघ्र निपटारा सुनिश्चित किया जा सके। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का उद्देश्य नेताओं के खिलाफ पांच हजार से अधिक आपराधिक मामलों में त्वरित सुनवाई सुनिश्चत करना था। सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष अदालतों से यह भी कहा था कि वे दुर्लभ और बाध्यकारी वजहों को छोड़कर ऐसे मामलों की सुनवाई स्थगित न करें।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट, जिला न्यायाधीशों और सांसदों-विधायकों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए गठित विशेष अदालतों को कई निर्देश जारी करते हुए स्पष्ट किया था कि जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि ऐसे मामलों में फैसला आने में अनावश्यक देरी न हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हम इस बात को सभी हाई कोर्ट पर छोड़ना उचित समझते हैं कि वे ऐसी पद्धति विकसित करें या ऐसे उपाय लागू करें, जिन्हें वे प्रभावी निगरानी के लिए उचित समझें। सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि हाईकोर्ट मामलों के शीघ्र और प्रभावी निस्तारण के लिए सभी दिशाओं में ऐसे आवश्यक आदेश जारी कर सकते हैं।




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