डॉक्टर-वकील दोनों पर हाईकोर्ट सख्त, विवाद की जांच को बनाई कमेटी, प्रशासन को बल प्रयोग की छूट
यूपी के प्रयागराज में डॅाक्टरों और वकीलों के बीच हुए विवाद की न्यायिक जांच का इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने कमेटी बनाते हुए रिटायर्ड जज न्यायमूर्ति अरुण टंडन को जांच की जिम्मेदारी सौंपी है। डॉक्टरों की हड़ताल और वकीलों के चक्काजाम से कड़ाई से निपटने का आदेश दिया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रयागराज में डॉक्टरों की हड़ताल और अधिवक्ताओं के चक्काजाम और प्रदर्शन दोनों पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि किसी भी विवाद के कारण आम नागरिकों को आवागमन की स्वतंत्रता या सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा सुविधा से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नागरिकों की आवाजाही रोकना या उन्हें चिकित्सा सहायता से वंचित करना मूलतः आपराधिक कृत्य है। हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी और पुलिस आयुक्त, प्रयागराज को निर्देश दिया कि यदि कोई भी पेशेवर समूह इस मामले को लेकर यातायात बाधित करता है तो प्रशासन कानून के तहत उपलब्ध सभी शक्तियों, आवश्यक होने पर बल प्रयोग सहित, का उपयोग कर बाधा हटाए और शहर में यातायात सुचारु रखे।
विवाद की जांच के लिए बनाई न्यायिक कमेटी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिवक्ता जागृति शुक्ला की दुर्घटना के बाद इलाज में कथित लापरवाही, एसआरएन अस्पताल में डॉक्टरों और अधिवक्ताओं के बीच हुए विवाद तथा उससे उपजे घटनाक्रम को अत्यंत गंभीर मानते हुए पूरे मामले की जांच सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरुण टंडन से कराने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि घटनाक्रम को देखते हुए जिला प्रशासन द्वारा की जाने वाली जांच निष्पक्ष होने को लेकर संदेह उत्पन्न होता है और मामले में निष्पक्ष जांच आवश्यक है। न्यायमूर्ति सलील कुमार राय और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष एवं सचिव द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर यह आदेश पारित किया। मामले की अगली सुनवाई 27 जुलाई 2026 को होगी।
क्या है मामला
अदालत के समक्ष रखे गए तथ्यों के अनुसार 20 मई 2026 को सुबह लगभग 5 बजे हाईकोर्ट क्रिकेट मैदान जाते समय अधिवक्ता जागृति शुक्ला दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। उन्हें अन्य अधिवक्ताओं द्वारा तत्काल स्वरूप रानी नेहरू (एसआरएन) अस्पताल ले जाया गया। आरोप है कि ड्यूटी पर मौजूद इमरजेंसी मेडिकल अधिकारी सो रहे थे तथा उन्होंने घायल का उपचार करने से इनकार कर दिया। महिला अधिवक्ताओं के साथ दुर्व्यवहार का भी आरोप लगाया गया, जिसके बाद अस्पताल परिसर में डॉक्टरों और अधिवक्ताओं के बीच हाथापाई हो गई। बाद में जागृति शुक्ला को निजी अस्पताल और फिर लखनऊ स्थित एसजीपीजीआई भेजा गया, जहां 7 जून 2026 को उपचार के दौरान उनका निधन हो गया।
अदालत ने कहा कि एसआरएन अस्पताल में मरीजों को मिलने वाली चिकित्सा सुविधाओं को लेकर आम जनता में पहले से शिकायतें रही हैं और विभिन्न जनहित याचिकाओं में भी ऐसे मुद्दे उठाए गए हैं। अदालत ने कहा कि इस पृष्ठभूमि में यह वैध संदेह उत्पन्न होता है कि जागृति शुक्ला को आवश्यक चिकित्सा उपचार समय पर नहीं मिला और उपचार की मांग कर रहे अधिवक्ताओं के साथ मारपीट किए जाने के आरोप भी सत्य हो सकते हैं।
खंडपीठ ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि 20 मई के बाद की घटनाओं ने दो पेशेवर समूहों के बीच प्रतिद्वंद्विता का रूप ले लिया है। ऐसे में जिला प्रशासन की जांच दिखावटी जांच बन सकती है और रिपोर्ट किसी एक पक्ष के दबाव में पक्षपातपूर्ण हो सकती है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह चिकित्सा लापरवाही के आरोपों पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं कर रही है क्योंकि इसके लिए विशेषज्ञ राय आवश्यक होगी।
इन बिंदुओं पर होगी जांच
हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरुण टंडन से निम्न बिंदुओं पर जांच करने का अनुरोध किया है-
-क्या 20 मई 2026 को एसआरएन अस्पताल लाए जाने पर जागृति शुक्ला को तत्काल और आवश्यक चिकित्सा उपचार दिया गया था?
-क्या उन्हें उपलब्ध कराई गई चिकित्सा सेवा निर्धारित मानकों के अनुरूप थी और क्या उनकी मृत्यु उपचार में किसी लापरवाही का परिणाम थी?
-डॉक्टरों, अस्पताल कर्मियों और अधिवक्ताओं के बीच हुए संघर्ष के लिए कौन जिम्मेदार था तथा ट्रॉमा सेंटर में तैनात पुलिसकर्मियों ने व्यवस्था बनाए रखने और आपात चिकित्सा सेवाएं निर्बाध रखने के लिए क्या कदम उठाए?
उपरोक्त मुद्दों से संबंधित अन्य आवश्यक पहलुओं की भी जांच की जाएगी। अदालत ने जांच अधिकारी को इलेक्ट्रॉनिक अथवा दस्तावेजी रिकॉर्ड मंगाने, गवाहों को तलब करने, विशेषज्ञों और स्वतंत्र व्यक्तियों की सहायता लेने की पूरी स्वतंत्रता दी है। हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को जांच के लिए सभी प्रशासनिक, वित्तीय और सचिवीय सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। जांच रिपोर्ट 30 सितंबर 2026 तक सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत करने को कहा गया है। साथ ही विवेचक (आईओ) को निर्देश दिया गया है कि वह जांच की प्रत्येक प्रगति से न्यायिक जांच अधिकारी को अवगत कराता रहे।
डॉक्टरों की गिरफ्तारी पर रोक
मंगलवार को कोर्ट ने पुलिस को जांच की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा था। अदालत के समक्ष प्रथम सूचना रिपोर्ट की विवेचना की केस डायरी प्रस्तुत की गई। अदालत ने पाया कि विवेचक ने अब तक किसी आरोपी की गिरफ्तारी आवश्यक नहीं समझी है। घटना को काफी समय बीत जाने और आरोपियों के चिकित्सक होने का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि फिलहाल हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। इसके चलते अदालत ने आदेश दिया कि विवेचना जारी रहेगी, लेकिन किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं की जाएगी। यदि किसी को गिरफ्तार किया गया हो तो उसे निजी मुचलके पर रिहा किया जाएगा।
काम पर न लौटने वाले डॉक्टरों को निलंबित करने का आदेश
अदालत ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी, मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य और एसआरएन अस्पताल प्रशासन को निर्देश दिया कि हड़ताल पर गए डॉक्टर और कर्मचारी उसी दिन ड्यूटी पर लौटें। आदेश का पालन न करने वालों को तत्काल निलंबित कर इसकी सूचना न्यायालय को दी जाए। यह निर्देश अन्य सरकारी चिकित्सा संस्थानों पर भी लागू होगा।
अवमानना की चेतावनी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके आदेशों का उल्लंघन यदि बार के सदस्य, डॉक्टर, शिक्षक, कर्मचारी अथवा किसी भी सरकारी चिकित्सा संस्थान का कार्मिक करता है तो इसे न्यायालय की अवमानना माना जाएगा और दोषी के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी।
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को भी पक्षकार बनाया
अदालत ने मामले में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी), नई दिल्ली को भी पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने कहा कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की बार-बार होने वाली हड़तालों की पुनरावृत्ति रोकने के उद्देश्य से आयोग को तलब किया जा रहा है।




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