पति पर केस दर्ज कराने मात्र से आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप नहीं बनता, हाईकोर्ट ने पत्नी को दी राहत
हईकोर्ट ने कहा है कि पत्नी और उसके रिश्तेदारों को पति की आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी सिर्फ इसलिए नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उन्होंने वैवाहिक विवाद को लेकर उसके खिलाफ केस दर्ज कराए। न्यायमूर्ति समीर जैन की पीठ ने इस तरह पत्नी और उसके परिवार वालों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की।

UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी पत्नी और उसके रिश्तेदारों को उसके पति की आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी सिर्फ इसलिए नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उन्होंने वैवाहिक विवाद को लेकर उसके खिलाफ केस दर्ज कराए। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ केस दर्ज कराने से, भले ही वे झूठे होने का आरोप हों, आईपीसी की धारा 306 के तहत अपराध साबित करने के लिए अपराधिक इरादा साबित करना जरूरी है। न्यायमूर्ति समीर जैन की पीठ ने इस तरह पत्नी और उसके परिवार वालों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह साबित हो कि उनका मृतक (पति) को आत्महत्या के लिए उकसाने का कोई आपराधिक इरादा था। कोर्ट ने कहा, कि इस अदालत की राय में, सिर्फ केस दर्ज कराने से भले ही वे झूठे केस हों, यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपियों का मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाने का कोई अपराधी इरादा था। मृतक झूठे केसों की वजह से मानसिक तनाव में था, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि उसके पास आत्महत्या करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था। मृतक के पिता ने आरोप लगाया कि बेटे की पत्नी (याचिकाकर्ता) उनके बेटे पर पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सा देने का दबाव डाल रही थी। जिससे उसने खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली।
मनमुताबिक आदेश के लिए बार-बार याचिका गलत
हाईकोर्ट ने एक निर्णय में दंड प्रक्रिया पर कहा है कि एक ही मामले में अलग-अलग आधारों पर याचिका दाखिल करना कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इसे ‘फोरम शॉपिंग’ कहा जाता है। कोर्ट ने कहा कि संबंधित आरोपी-प्रतिवादियों के पास जो आधार/दलील पहले से उपलब्ध थे, उसे उन्होंने पहली याचिका में नहीं उठाया। उसी आधार पर दूसरी याचिका दाखिल करना स्वीकार्य नहीं है। वाराणसी के राम दुलार सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि एक बार किसी मुद्दे को छोड़ दिया गया हो, तो उसे बाद में फिर से उठाना उचित नहीं माना जा सकता।
आशंका पर नहीं रोका जाए पासपोर्ट नवीनीकरण
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि पासपोर्ट का नवीनीकरण केवल आशंका के आधार पर नहीं रोका जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट का नवीनीकरण कराना किसी भी नागरिक का वैध अधिकार है। इसे केवल इस भय या आशंका पर नहीं रोका जा सकता कि संबंधित व्यक्ति देश वापस नहीं लौटेगा। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने दिलीप की याचिका पर सुनवाई के बाद एसीजेएम अदालत के आदेश को निरस्त करते और याचिका मंजूर करते हुए दिया है।




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