मैनपुरी के तत्कालीन एसडीएम कर्मेंद्र सिंह और एसपी रहे अजय कुमार मिश्र को हाईकोर्ट का नोटिस
हाईकोर्ट ने तत्कालीन एसडीएम मैनपुरी कर्मेंद्र सिंह द्वारा घटना की मजिस्ट्रियल रिपोर्ट पर नाराजगी व्यक्त की और बेहतर हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2009 में मैनपुरी पुलिस की अभिरक्षा में हुई दिव्यांग की मौत मामले में वहां के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक, अजय कुमार मिश्र (वर्तमान पुलिस महानिरीक्षक प्रयागराज रेंज) और तत्कालीन एडीएम कर्मेंद्र सिंह (वर्तमान अतिरिक्त सचिव, सचिवालय देहरादून उत्तराखंड सरकार) को पक्षकार बनाते हुए उन्हें नोटिस जारी कर हलफनामा मांगा है।
यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी एंड लीगल इनीशिएटिव लखनऊ की जनहित याचिका पर दिया है। नौ मई 2009 को मैनपुरी के धन्नाहार थाने में पुलिस लॉकअप के अंदर शौचालय में नाहर सिंह उर्फ स्नेह नामक पोलियो ग्रसित 23 वर्षीय युवक की मृत्यु हो गई थी। उसकी लाश फंदे से लटकी मिली थी, जिसे खुदकुशी बताया गया।
मजिस्ट्रियल रिपोर्ट पर जताई नाराजगी
याची के अधिवक्ता अंकुर शर्मा ने बहस की। कोर्ट ने तत्कालीन एसडीएम मैनपुरी कर्मेंद्र सिंह द्वारा घटना की मजिस्ट्रियल रिपोर्ट पर नाराजगी व्यक्त की और बेहतर हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया। उन्हें अगली सुनवाई पर 16 मार्च को उपस्थित रहने का आदेश भी दिया गया। कोर्ट ने मामले में पुलिस एवं प्रशासन की कार्रवाई पर कुछ अहम सवाल भी पूछे। कोर्ट ने घटना की वीडियोग्राफी एवं उससे संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने का आदेश दिया एवं पुलिस अभिलेखों में उक्त घटना की प्रविष्टि से संबंधित भी कुछ अहम सवाल पुलिस एवं प्रशासन से किए।
धन्नाहार के थानाध्यक्ष को भी अभिलेख व हलफनामा सहित हाजिर होने का आदेश दिया। यह जनहित याचिका मैनपुरी के 23 वर्षीय विकलांग युवक नाहर सिंह की पुलिस अभिरक्षा में हुई मृत्यु प्रकरण में दोषी अधिकारियों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कर सीबीआई जांच की मांग के लिए दाखिल की गई है। कहा गया है कि स्थानीय पुलिस प्रशासन ने मामले को आत्महत्या का रूप देकर रफा दफा कर दिया था।
परिवार की नाराज़गी पर घर से भागकर किसी के साथ रहना भर अपराध नहीं: हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि माता-पिता की फटकार के बाद घर छोड़कर प्रेमी से मिलने और नेपाल जाकर 67 दिन साथ रहने के नाबालिग पीड़िता के बयान पर यह नहीं कहा जा सकता कि उसका अपहरण किया गया था। कोर्ट ने कहा कि नाबालिग का अपनी मर्जी से घर से भागकर किसी के साथ रहने भर से अपराध नहीं बनता। यह आदेश न्यायमूर्ति अनिल कुमार ने सुनील की अपील पर दिया है। इसी के साथ कोर्ट ने अपहरण के आरोप में विशेष न्यायाधीश सिद्धार्थनगर द्वारा जारी सम्मन आदेश सहित आपराधिक मुकदमे की कार्यवाही रद्द कर दी है। अपील में संज्ञान लेने व सम्मन जारी करने सहित केस कार्यवाही की वैधता को चुनौती दी गई थी।
अपीलार्थी के अधिवक्ता दीपक कुमार श्रीवास्तव का कहना था कि 17 वर्षीय पीड़िता ने माता-पिता की डांट फटकार के कारण घर छोड़ दिया और अपीलार्थी से आ मिली। दोनों कुछ दिनों तक नेपाल में रहे और वापस लौटने पर भी पीड़िता अपने पिता के घर नहीं गई। पीड़िता ने अदालत में बयान दिया कि वह पिछले चार साल से अपीलार्थी से बातचीत कर रही है। दोनों नेपाल में साथ रहे, उसके साथ कुछ ग़लत नहीं किया गया। उसने स्वयं घर छोड़ा था। उसका अपहरण नहीं किया गया। इस पर हाईकोर्ट ने मुकदमे की कार्यवाही रद्द कर दी।




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